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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 295
मनुष्यमारणे क्षिप्रं चौरवत्किल्बिषं भवेत्‌ । प्राणभृत्सु महत्स्वर्धं गोगजोष्ट्रहयादिषु ।।
(अब एक बार अपराध होने पर दण्ड-विधान कहते हैं--) सारथि की असावधानी से मनुष्य के मर जाने पर उसे (सारथि को) चोर के समान पाप लगता है (अतः वह उत्तम साहस” अर्थात्‌ १००० पण से दण्डनीय होता है), तथा बड़े जीव, ऊंट, गाय, बैल, हाथी, घोड़ा आदि के मरने पर आधा पाप लगता है (अत: वह “मध्यम साहस” अर्थात्‌ ५०० पण से दण्डनीय होता है)।
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