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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 55
ब्रूहीत्युक्तश्च न ब्रूयादुक्तं च न विभावयेत्‌ । न च पूर्वापरं विद्यात्तस्मादर्थात्स हीयते ।।
जो पूर्वकथित बातों का समर्थन प्रमाणों द्वारा नहीं करे, “कौन बात मुझे कहनी है?” यह (घबड़ाने के कारण) नहीं समझकर दूसरी (अपने प्रतिकूल एवं प्रतिपक्षी के अनुकूल) ही बात कहने लग जाय अर्थात्‌ घबड़ाने से आगे पीछे की बात या अपने कार्य को सिद्ध करनेवाली बात नहीं कहकर चाहे जो कुछ कहे, वह ऋणदाता ऋण का (धन का) अधिकारी नहीं होता है।
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