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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 200
विक्रयाद्यो धनं किंचिदगृह्णीयात्कुलसन्निधौ । क्रयेण स विशुद्धं हि न्यायतो लभते धनम्‌ ।।
जो कोई वस्तु विक्रय (बेचने के) स्थान (बाजार या दुकान आदि) से बेचनेवालो अर्थात्‌ अनेक व्यापारियों के प्रत्यक्ष में खरीदी जाती है, उस दोष-रहित धन को न्यायपूर्वक खरीदनेवाला बेचनेवाले से प्राप्त करता है अर्थात्‌ वस्तु का स्वामी नहीं होने पर सर्वप्रत्यक्ष बेची गयी उस वस्तु का मूल्य खरीददार को बेचनेवाले से प्राप्तव्य होता है।
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