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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 4
तेषामाद्यमृणादानं विक्षेपोऽस्वामिविक्रयः । सम्भूय च समुत्थानं दत्तस्यानपकर्म च ।।
१. ऋण लेना, २. धरोहर (थाती) रखना, ३. किसी वस्तु या भूमि आदि का स्वामी न होने पर भी उसे बेच देना, ४. अनेक व्यक्तियों (व्यापारी आदि) का मिलकर संयुक्त रूप से कार्य करना, ५. दान आदि में दी गयी सम्पत्ति या किसी वस्तु को क्रोध, लोभ या अपात्रता के कारण वापस ले लेना,
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