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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 283
त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः । मांसभेत्ता तु षण्णष्कान्प्रवास्यस्त्वस्थिभेदकः ।।
समान जातिवाला यदि (मारने से) किसी का चमड़ा निकाल दे अर्थात्‌ ऐसा मारे कि आहत व्यक्ति का चमड़ा छूट जाय या रक्त बहने लगे तो सौ पण का दंड, मांस निकल आवे तो ६ निष्क (८।१३७) का दंड और हड्डी टूट जाय तो राज्य से बाहर निर्वासन का दंड अपराधी को सजा दे।
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