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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 155
चक्रवृद्धिं समारूढो देशकालव्यवस्थितः । अतिक्रामन्देशकालौ न तत्फलमवाप्नुयात्‌ ।।
देश तथा काल की वृद्धि (भाड़ा-अमुक स्थान तक यह बोझ पहुँचाने का अथवा अमुक समय तक काम करने का इतना धन लूँगा इस प्रकार) निश्चय करने के बाद में देश या समय का उल्लंघन करे (उस नियत स्थान तक बोझ नहीं पहुँचावे या उतने समय तक कार्य नहीं करे) तब वह उसका भाड़ा पाने का अधिकारी नहीं होता है।
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