अनादेयं नाददीत परिक्षीणोऽपि पार्थिवः ।
न चादेयं समृद्धोऽपि सूक्ष्ममप्यर्थमुत्सृजेत् ।।
धनादि से क्षीण भी राजा को अग्राह्य धन नहीं लेना चाहिए तथा समृद्धिमान् होते हुए भी (राजा को) ग्राह्य थोड़ा भी धन नहीं छोड़ना चाहिये।
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