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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 195
निक्षिप्तस्य धनस्यैवं प्रीत्योपनिहितस्य च । राजा विनिर्णयं कुर्यादक्षिण्वन्यासधारिणम्‌ ।।
राजा (या न्यायाधीश मुहरबन्द या बिना मुहरबन्द दिये गये धरोहर का अथवा भोगार्थ प्रेमपूर्वक दी गयी (धन, वस्र आभूषणादि) महंगी वस्तुओं का निर्णय, लेनेवाले को यथासम्भव अपीडित करता हुआ करे।
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