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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 331
स्यात्साहसं त्वन्वयवत्प्रसभं कर्म यत्कृतम्‌ । निरन्वयं भवेत्स्तेयं हृत्वापव्ययते च यत्‌ ।।
वस्तु-स्वामी के सामने से बलात्कारपूर्वक किसी वस्तु का अपहरण करना 'साहस' (डाका डालना) और वस्तुस्वामी के परोक्ष में (नहीं रहने पर चुपके से) किसी वस्तु का अपहरण कर भाग जाना (या अपहरण करने के बाद में अस्विकार करना) "स्तेय" (चोरी करना) कहलाता है।
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