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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 129
वधेनापि यदा त्वेतान्निग्रहीतुं न शक्रुयात्‌ । तदैषु सर्वमप्येतत्प्रयु्जीत चतुष्टयम्‌ ।।
यदि (राजा या न्यायाधीश) वध (शरीरताडनच्छेदन आदि) से भी इसे (अपराधी को) वश में नहीं कर सके तो इन चारों (८।१२९) प्रकार के दण्डों से एक साथ उसे दण्डित करे।
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