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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 172
तस्माद्यम इव स्वामी स्वयं हित्वा प्रियाप्रिये । वर्तेत याम्यया वृत्त्या जितक्रोधो जितेन्द्रियः ।।
इसलिए राजा क्रोध तथा इन्द्रियों को वश में करके और अपने प्रिय तथा अप्रिय का त्यागकर यमराज के समान सर्वत्र समव्यवहार रखते हुए वर्ताव करे।
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