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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 316
अन्नादे भ्रूणहा मार्टि पत्यौ भार्याऽपचारिणी । गुरौ शिष्यश्च याज्यश्चस्तेनो राजनि किल्बिषम्‌ ।।
भ्रूणहत्या करने वाला अपने (भ्रूणहत्या करने वाले का) अन्न खाने वाले को, व्व्यभिचारिणी स्त्री (जार को सहने अर्थात्‌ मना नहीं करने वाले) पति को, शिष्य (सन्ध्याव्वन्दनादि नित्य-कृत्यत्याग को सहने वाले) गुरु को, याज्य अर्थात्‌ यजमान (विधि का त्त्यागकर यज्ञादि कर्म करते रहने पर भी उसे सहन करने वाले अर्थात्‌ विधिपूर्वक यज्ञादि व्कर्म को करने के लिए प्रेरित नहीं करने वाले) गुरु को और चोर (दण्डित नहीं करने वाले) राजा को अपना-अपना अपराध (पापजन्य दोष) दे देते हैं।
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