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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 113
अग्निं वाऽ ऽ हारयेदेनमप्सु चैनं निमज्जयेत्‌ । पुत्रदारस्य वाऽप्येनं शिरांसि स्पर्शयेत्पृथक्‌ ।।
अथवा (मुकदमें के बड़ा या छोटा होने की अपेक्षा) इस शूद्र से अग्नि लेकर सात कदम चलावे, जोंक आदि से रहित पानी में डूबावे अथवा इसके पुत्र तथा स्त्री के शिर का पृथक्‌-पृथक्‌ स्पर्श करावे।
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