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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 351
नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन । प्रदाशं वाऽप्रकाशं वा मन्युस्तं मन्युमृच्छति ।।
सबके सामने या एकान्त में (मारने आदि के लिए उच्यत) आततायी के वध करने में वधकर्त्ता को दोष नहीं होता है; क्योंकि मारने वाले अर्थात्‌ आततायी का क्रोध मारे जाते हुए के क्रोध को बढ़ाता है।
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