सबके सामने या एकान्त में (मारने आदि के लिए उच्यत) आततायी के वध करने में वधकर्त्ता को दोष नहीं होता है; क्योंकि मारने वाले अर्थात् आततायी का क्रोध मारे जाते हुए के क्रोध को बढ़ाता है।
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