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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 345
साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः । स विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति ।।
साहस (बलात्कार से धन-जनापहरण आदि) कर्म में तत्पर मनुष्य को जो राजा क्षमा करता है, वह शीघ्र ही नष्ट होता तथा प्रजा का विद्वेषपात्र भी बनता है।
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