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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 57
अभियोक्ता न चेदब्रूयादबन्ध्यो दण्ड्यश्च धर्मतः । न चेत्‌ त्रिपक्षात्रब्रूयाद्धर्म॑ प्रति पराजितः ।।
जो वादी (अर्थी = मुद्दई पहले मुकदमा दायर कर) बाद में कुछ न कहे, वह धर्मानुसार (बड़े-छोटे मुकदमे के अनुसार) वध्य (फाँसी देने योग्य) या दण्ड्य (ताडन या अर्थदण्ड जुर्माना करने योग्य) है और यदि प्रत्यर्थी (मुद्दालह) तीन पक्ष में नहीं बोले अर्थात्‌ मुद्दद की बातों का सन्तोषजनक उत्तर न दे तो वह धर्मानुसार (कपटपूर्वक नहीं) पराजित होता है।
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