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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 52
अदेशं यश्च दिशति निर्दिश्यापह् ते च यः । यश्चाधरोत्तरानर्थान्विगीतान्नावबुध्यते ।।
यदि ऋणदाता ऐसे स्थान पर ऋण देना बतलावे जहाँ ऋण-ग्रहीता का उस समय रहना सर्वथा असम्भव हो, अथवा किसी स्थान को पहले कहकर बाद में उसे कहना स्वीकार न करे, बात को पूर्वापर विरुद्ध कहे (पहले कही हुई बात से बाद में कही हुई बात का मिलान नहीं हो, दोनों एक दूसरे के विरूद्ध पड़ती हों), पहले अपने हाथ से ऋण देना बतलाकर बाद में अपने पुत्र आदि के हाथ से ऋण देना कहने लगे,
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