यः साधयन्तं छन्देन वेदयेद्धनिकं नृपे।
स राज्ञा तच्चतुर्भागं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ।।
"मैं राजा का प्रियपात्र हूँ" इत्यादि अभिमान से धन वसूल करते हुए ऋणदाता को जो ऋणी निवेदन (शिकायत) करे राजा उसे ऋण धन के चतुर्थांश धन से दण्डित करे तथा उसका वह धन भी दिलवा दे।
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