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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 94
अन्धो मत्स्यानिवाश्चाति स नरः कण्टकैः सह । यो भाषतेऽर्थवैकल्यमप्रत्यक्षं सभां गतः ।।
जो न्यायालय में जाकर बात को अस्तव्यस्त कर (गड़बड़ करके असत्य) बोलता है या बिना देखी हुई बात कहता है, वह मनुष्य काँटे सहित मछली को खानेवाले अन्धे के समान दु:खी होता है।
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