यो यथा निक्षिपेद्धस्ते यमर्थं यस्य मानवः ।
स तथैव ग्रहीतव्यो यथा दायस्तथा ग्रहः ।।
जो मनुष्य जिस प्रकार (मुहर बन्द या बिना मुहर बन्द, गवाह के सामने या एकान्त में इत्यादि) से जिसके हाथ में जो धन (धरोहर के रूप में) रक्खे, उस धन को उसी प्रकार (मुहरबन्द या बिना मुहरबन्द, गवाह के सामने या एकान्त में) उसी लेनेवाले के हाथ से वह (धरोहर रखनेवाला) वापस ले; क्योंकि जिस रूप में दिया जाता है, उसी रूप में लेना न्यायसङ्गत है।
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