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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 355
यस्त्वनाक्षारितः पूर्वमभिभाषेत कारणात्‌ । न दोष प्राप्नुयात्किञ्चिन्न हि तस्य व्यतिक्रमः ।।
पहले कभी भी परस्री-सम्भोग के विषय में अनिन्दित पुरुष किसी कारण से परस्री के साथ एकान्त में बातचीत करे तो वह कुछ दोषी नहीं होता है, क्योंकि उसका कोई अपराध नहीं है।
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