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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 339
योऽदत्तादायिनो हस्ताल्लिप्सेत ब्राह्मणो धनम्‌ । याजनाध्यापनेनापि यथा स्तेनस्तथैव सः ।।
जो ब्राह्मण नहीं दी गयी वस्तु (या धन) को चुराने वाले चोर के हाथ से यज्ञ कराने या पढ़ाने की दक्षिणा भी (“यह दूसरे का है" ऐसा जानता हुआ) लेने की इच्छा करे तो जैसा चोर है वैसा वह ब्राह्मण भी है, (अतएव ऐसा ब्राह्मण भी चोर के समान दण्डनीय है)।
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