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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 153
ऋणं दातुमशक्तो यः कर्तुमिच्छेत्पुनः क्रियाम्‌ । स दत्त्वा निर्जितां वृद्धिं करणं परिवर्तयेत्‌ ।।
निर्धारित समय पर ऋण चुकाने में असमर्थ ऋणी यदि फिर (हैण्डनोट आदि लिखना) चाहे तो वह वास्तविक सूद देकर हैण्डनोट आदि को बदल दे (नया लिख दे)।
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