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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 43
यथा नयत्यसृक्यातैर्मृगस्य मृगयुः पदम्‌ । नयेत्तथाऽनुमानेन धर्मस्य नृपतिः पदम्‌ ।।
जिस प्रकार शिकारी मृग के रक्तचाप (से चिह्नित मार्ग) से स्थान का निश्चय कर लेता है, उसी प्रकार राजा को अनुमान (८।२५-२६), या प्रत्यक्ष प्रमाण) से धर्म के तत्त्व का निर्णय करना चाहिए।
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