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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 134
पलं सुवर्णाश्चत्वारः पलानि धरणं दश । द्वे कृष्णले समधृते विज्ञेयो रूप्यमाषकः ।।
चार सुवर्णो (रुपये भर) का एक 'पल' (छटाँक), दश पलों का एक 'धरण' तथा दो कृष्णल (रत्तिओं) को काँटे (तराजू) पर रखने पर उसके बराबर एक 'रैप्यमाषक' जानना चाहिये।
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