आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतां मिथः ।
न विब्रूयान्नपो धर्म चिकीर्षह्वितमात्मनः ।।
(गार्हस्थ्यादि) आश्रम-सम्बन्धी धार्मिक विषयों में (“शास्त्र का ऐसा अभिप्राय है, तुम्हारे कहने के अनुसार नहीं है” इत्यादि रूप में) परस्पर विवाद करते हुए द्विजातीयों के कार्य में अपना हित चाहने वाला राजा “इस प्रकार धर्म (शास्त्रवचन) है” ऐसा कोई निर्णय न करे।
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