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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 90
एकोऽ हमस्मीत्यात्मानं यस्त्वं कल्याण मन्यसे । नित्यं स्थितस्ते हृद्येष पुण्यपापेक्षिता मुनिः ।।
हे कल्याणकारी चरित्र वाले! जो तुम “मैं अकेला हुँ", ऐसा आत्मा (जीवात्मा) को मानते हो (वैसा मत मानो, क्योंकि) पुण्य-पाप को देखेनेवाला सर्वश (परमात्मा) तुम्हारे हृदय में सर्वदा वर्तमान रहता है।
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