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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 18
राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः । एनो गच्छति कर्त्तारं निन्दार्हो यत्र निन्द्यते ।।
जिस सभा (न्यायालय = कचहरी) में निन्दनीय अर्थी (मुद्दई) तथा प्रत्यर्थी (मुद्दालह) निन्दित अर्थात्‌ न्यायपूर्वक दण्डित होता है, उस सभा में पापकर्ता ही पापभागी होता हे और राजा तथा सभासद (न्यायाधीश) को दोष नहीं लगता । अतएव राजा का कर्तव्य है कि वह धर्मात्मा सभासदों को इस काम में नियुक्त करे तथा सभासदों का कर्तव्य है कि वे धर्म को लक्ष्यकर अपराध के अनुसार अपराधी को दण्डित करे)।
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