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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 114
यमिद्धो न दहत्यग्निरापो नोन्मज्जयन्ति च॑ । न चार्त्तिमृच्छति क्षिप्रं स ज्ञेयः शपथे शुचिः ।।
(वैसा करने पर) जिस साक्षी करनेवाले को अग्नि (तपाया हुआ लौह) नहीं जलावे, पानी ऊपर को नहीं फेंके तथा शीघ्र वह दुःख नहीं पावे; उस साक्षी करनेवालों को शपथ में सच्चा समझना चाहिये।
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