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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 338
वानस्पत्यं मूलफलं दार्वग्न्यर्थं तथैव च । तृणं च गोभ्यो ग्रासार्थमस्तेयं मनुरब्रवीत्‌ ।।
(बिना घेरी हुई) वनस्पतियों के मूल तथा फल, अग्निहोत्र के लिए समिधा (हवनकाष्ठ) और गोग्रास के लिए घास ग्रहण करने को मनु ने चोरी नहीं कहा हे।
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