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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 225
पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्यास्वेव प्रतिष्ठिताः । नाकन्यासु क्कचित्नृणां लुप्तधर्मक्रिया हि ताः ।।
विवाह-सम्बन्धी मन्त्र कन्याओं के ही विषय में नियत हैं, अकन्याओं के (क्षतयोनि होने से दूषित कन्याओं) के विषय में कहीं (किसी शास्त्रों में) भी नहीं, क्योंकि वे (दूषित कन्याएँ) धर्म कार्य से हीन हैं।
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