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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 212
यदि संसाधयेत्तत्तु दर्पाल्लोभेन वा पुनः । राज्ञा दाप्यः सुवर्ण स्यात्तस्य स्तेयस्य निष्कृतिः ।।
यदि धर्मार्थ कहकर लिया हुआ धन वह (याचक धर्मकार्य में नहीं लगाते हुए भी) दाता को मांगने पर मद या लोभ के कारण वापस नहीं लोटावे (अर्थात्‌ स्वीकृत | धन को दाता से बलपूर्वक ग्रहण करे) तो राजा उसे चोरी के पाप की निवृत्ति (दूर करने) के लिए उसे (उक्त धन नहीं लौटानेवाले को) एक सुवर्ण (८।१३४) से दण्डित करे (और दाता को उक्त धन दिलवा ही दे)।
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