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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 50
अर्थेऽपव्ययमानं तु कारणेनं विभावितम्‌ । दापयेद्धनिकस्यार्थ दण्डलेशं च शक्तितः ।।
यदि ऋण लेनेवाला ऋण को मुकर जाय अर्थात्‌ मैने ऋण नहीं लिया है। ऐसे मना कर दे तथा लेख और साक्षी के द्वारा उसका ऋण लेना प्रमाणित हो जाय तो राजा ऋण लेनेवाले से ऋण में लिया हुआ धन ऋणपूर्तिरूप में तथा ऋण का दशांश अतिरिक्त धन दण्डरूप में ऋण देनेवाले के लिए (१०।१३५ के अनुसार) दिलवावे।
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