विद्शूद्रयोरेवमेव स्वजातिं प्रति तत्त्वतः ।
छेदवर्ज प्रणयनं दण्डस्येति विनिश्चयः ।।
वैश्य तथा शूद्र के परस्पर, अपनी जाति के प्रति पातक सम्बन्धी निन्दा करने पर जिह्वाच्छेद (जीभ काटना) छोड़कर इसी प्रकार (८।१३८) दण्ड देना चाहिये, यह शास्रनिर्णय है।
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