कामिनी के विषय में (अनेक अपनी स्त्रियो के रहने पर "मैं तुमसे ही बहुत प्रेम करता हूँ दूसरी से नहीं" ऐसा शपथकर रति आदि करने के विषय में), विवाहों में (मैं दूसरी स्त्री के साथ विवाह नहीं करूंगा ऐसा, अथवा--कन्यादि के विवाह के विषय में अर्थात् बहुत गुणवती एवं सुन्दरी है” इत्यादि कहकर कन्या के विवाह कराने में), गौओं के भूसा-घास आदि के विषय में, होम के लिए लकड़ी लेने के विषय में तथा ब्राह्मणरक्षार्थ स्वीकृत धनादि के विषय में असत्य शपथ करने में पाप नहीं होता है।
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