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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 111
कामिनीषु विवाहेषु गवां भक्ष्ये तथेन्धने । ब्राह्मणाभ्युपपत्तौ च शपथे नास्ति पातकम्‌ ।।
कामिनी के विषय में (अनेक अपनी स्त्रियो के रहने पर "मैं तुमसे ही बहुत प्रेम करता हूँ दूसरी से नहीं" ऐसा शपथकर रति आदि करने के विषय में), विवाहों में (मैं दूसरी स्त्री के साथ विवाह नहीं करूंगा ऐसा, अथवा--कन्यादि के विवाह के विषय में अर्थात्‌ बहुत गुणवती एवं सुन्दरी है” इत्यादि कहकर कन्या के विवाह कराने में), गौओं के भूसा-घास आदि के विषय में, होम के लिए लकड़ी लेने के विषय में तथा ब्राह्मणरक्षार्थ स्वीकृत धनादि के विषय में असत्य शपथ करने में पाप नहीं होता है।
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