कुटुम्बार्थेध्यधीनोऽपि व्यवहारं यमाचरेत् ।
स्वदेशे वा विदेशे वा तं ज्यायान्न विचालयेत् ।।
स्वामी (घर के मालिक) के देश या विदेश में रहने पर अधीन स्वरूप सेवक आदि ने भी कुटुम्ब के पालन-पोषणादि के लिए जो ऋण लिया हो, उसे स्वामी चुकता कर दे।
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