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मनुस्मृति • अध्याय 8 • श्लोक 13
यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ।।
जिस सभा (न्यायालय) में सभासदों (न्यायाधीशों जज; मजिस्ट्रेट आदि) के सामने (अर्थी तथा प्रत्यर्थी अर्थात्‌ क्रमश: मुद्दई और मुद्दालह दोनों के द्वारा या इनमें से किसी एक के द्वारा) धर्म-अधर्म से तथा सत्य-असत्य से पीड़ित होता (छिपाया जाता) है, उस सभा में वे सदस्य ही पाप से नष्ट होते हैं (अत: उनका कर्त्तव्य है कि वे असत्य बोलने वालों को दण्डित करें)।
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