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अध्याय 9 — नवम अध्याय

मनुस्मृति
336 श्लोक • केवल अनुवाद
महर्षि भृगुजी ऋषियों से कहते हैं कि अब मैं धर्म मार्ग में रहते हुए स्त्री-पुरुष के संयोग और वियोग होने (साथ और अलग रहने) पर नित्य (सनातन) धर्म को कहुँगा।
पति आदि आत्मीय जनों को चाहिये कि वे रात-दिन स्त्रियों को स्वाधीन रखें (उनकी देख-भाल किया करें-उन्हें स्वतन्त्र न रहने दें), अनिषिद्ध (रूप-रस आदि) विषयों में आसक्त होती हुई उन्हें अपने वश में करें।
स्त्री की रक्षा बचपन में पिता करता है, युवावस्था में पति करता है, वृद्धावस्था में पुत्र करते हैं; स्त्री स्वतन्त्र रहने के योग्य नहीं है। (पति-पुत्रहीन स्त्री की रक्षा युवावस्था में पिता आदि स्वजन भी कर सकते हैं, अतएव युवावस्था में पति का रक्षा करना प्रायिक समझना चाहिये)।
समय पर (ऋतुमती होने के पूर्व) नहीं देने (विवाह नहीं करने) वाला पिता निन्दनीय है, समय पर (ऋतुमती होने पर शुद्धि के बाद) सम्भोग नहीं करने वाला पति निन्दनीय होता है और पति के मर जाने पर माता की रक्षा नहीं करने वाला पुत्र निन्दनीय होता है।
साधारणतम प्रसङ्गों, (दु:शीलता-सम्पादक अवसरों) से स्त्रियों को विशेष रूप से बचाना चाहिये; क्योंकि अरक्षित स्त्रियँ दोनों (पिता तथा पति के) कुलो को सन्तप्त करती हैं।
(ब्राह्मण-क्षत्रियादि) समस्त वर्णो के इस उत्तम धर्म को देखते हुए दुर्बल (अन्धे, लंगड़े, रोगी, निर्धन आदि) पति भी स्त्री की रक्षा करने के लिए यत्न करते हैं।
(प्रयत्नपूर्वक) स्त्री की रक्षा करता हुआ मनुष्य अपनी सन्तान, आचरण, कुल, आत्मा और धर्म - इनकी रक्षा करता है; (इस कारण स्त्रियों की रक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिये।
पति वीर्यरूप से स्त्री में प्रवेशकर गर्भ होकर पुत्ररूप से उत्पन्न होता है, जाया (स्त्री) का वही जायात्व (स्त्रीपन) है; जो इस (स्त्री) में (पुत्र रूप से पति) पुनः उत्पन्न होता है।
स्त्री जिस प्रकार के (शास्त्रानुकूल या शास्त्रप्रतिकूल) पति का सेवन (सम्भोग) करती है, उसी प्रकार के (श्रेष्ठ या नीच) सन्तान को उत्पन्न करती है, अतएव स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये।
कोई (पिता, पति, पुत्रादि) बलात्कार कर स्त्री को रक्षा नहीं कर सकता, किन्तु इन (आगे कहे जाने वाले) उपायों से उन (स्त्रियों) की रक्षा की जा सकती है।
(पिता, पति या पुत्रादि अभिभावक) उस (स्त्री) को धन के संग्रह, व्यय, वस्तु तथा पदार्थो की शुद्धि, पति तथा अग्नि की सेवा (पति एवं गुरुजन को शुश्रूषा तथा अग्निहोत्र कर्म), घर तथा घर के वर्तन आदि की सफाई में नियुक्त करे।
(यदि स्त्रियाँ धर्मविरुद्ध बुद्धि होने से अपनी रक्षा स्वयं नहीं करती तो) आप्त एवं आज्ञाकारी पुरुषों से घर में रोकी गयी भी वे स्त्रियाँ अरक्षित हैं, जो स्त्रियाँ धर्मानुकूल बुद्धि होने से अपनी रक्षा स्वयं करती हैं, वे ही सुरक्षित हैं (अतः पति आदि अभिभावकों को चाहिये कि धर्म का सत्फल बतलाकर उन्हें संयम में रहने का उपदेश दें)।
(मद्यादि मादक द्रव्यों का) पीना (या प्रकारान्तर से सेवन करना), दुष्ट का संसर्ग, पति के साथ विरह, इधर-उधर घूमना, (असमय में) सोना और दूसरे के घर में निवास करना - ये स्त्रियों के छः दोष हैं (अतएव इनसे इन स्त्रियों को बचाना चाहिये)।
ये (स्त्रियाँ पुरुष के) सुन्दर रूप की परीक्षा नहीं करती, युवावस्था आदि में आदर (विशेष चाहना) नहीं करतीं, किन्तु "पुरुष है" इसी विचार से सुन्दर या कुरूप पुरुष के साथ सम्भोग करती है।
व्यभिचारिता (सम्भोगादि की अतिशय इच्छा होने) से चित्त को चञ्चलता से और स्वभावत: स्नेह का अभाव होने से यत्नपूर्वक (पति आदि के द्वारा) सुरक्षित भी ये (स्त्रियाँ व्यभिचारादि दोष से) पतियों में विकृत (विपरीत प्रकृति वाली) हो जाती हैं।
ब्रह्मा की सृष्टि से ही इनका ऐसा स्वभाव जानकर पुरुष इनकी रक्षा के लिए विशेष यत्न करे।
शय्या, आसन, आभूषण, काम, क्रोध, कुटिलता, द्रोहभाव और दुराचरण - इनको स्त्रियों के लिए मनु ने सृष्टि के प्रारम्भ में ही बनाया (अत एव यत्नपूर्वक इनसे स्त्रियों को बचाना चाहिये)।
इन (स्त्रियों) का जातकर्मादि संस्कार (वेदोक्त) मन्त्रों से नहीं होता, यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है; धर्मप्रमाण-श्रुति स्मृति से हीन और पापनाशक (वेदोक्त अघमर्षणादि) मन्त्रों के जप का अधिकार नहीं होने से पापयुक्त वे (स्त्रियाँ) असत्य के समान अपवित्र है यह शास्त्र की मर्यादा है (अतएव इनकी रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिये।
(स्त्री-स्वभाव को व्यभिचारशील बतलाकर अब उसमें प्रमाण कहते है-) और शास्त्रों में बहुत-सी श्रुतियाँ (“न चैतद्रिद्यो ब्राह्मणा: स्मोऽब्राह्मणा वा' इत्यादि वेदवाक्य) व्यभिचार की परीक्षा के लिए पढ़ी गयी हैं, उनमें से (प्रायश्चित्तरूप) एक श्रुति को (आप लोग) सुनें।
"दूसरे के घर में विचरण करती (जाती) हुई मेरी माता अतिव्रता होती हुई परपुरुष के प्रति लोभयुक्त अर्थात्‌ आकृष्ट हुई, उस (परपुरुष सङ्कल्प) से दूषित माता के रजोरूप वीर्य को मेरे पिता शुद्ध करे" यही पादत्रय स्त्री के व्यभिचार का उदाहरण है।
स्त्री परपुरुष-गमनरूप जो पति का अहित मन से सोचती है, उसी मानसिक व्यभिचार को शुद्ध करने वाला यह मन्त्र मनु आदि महर्षियों ने कहा है।
स्त्री जैसे गुण वाले (सद्गुणी या दुर्गुणी) पति के साथ विधिवत्‌ विवाहित होती है, वह समुद्र में मिली हुई नदी के समान वैसे ही गुणवाली (सद्गुणी पति के साथ सद्गुणवती और दुर्गुणी पति के साथ दुर्गुणवती) हो जाती है।
नीच योनि में उत्पन्न हुई 'अक्षमाला' नामक स्त्री वसिष्ठ से तथा “शारङ्गी” नाम की स्त्री “मन्दपाल” ऋषि से विवाहित होकर पूज्यता को प्राप्त हुई।
इन (पूर्व श्लोकोक्त 'अक्षमाला' तथा “शारङ्गी') और दूसरी ('सत्यवती' आदि) नीच कुलोत्पन्न स्त्रियों ने अपने-अपने पति के शुभ गुणों से श्रेष्ठता को प्राप्त किया है।
(महर्षि भृगुजी ऋषियों से कहते है कि मैंने) स्त्री-पुरुषों का सदा शुभ यह लोकाचार कहा, अब इस लोक में तथा परलोक में सुखदायक सन्तानों के धर्मो को (कहुँगा, उन्हें) आप लोग सुनें।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) हे महाभाग (मुनियों)! सन्तानोत्पादन के लिए वस्त्राभूषण से आदर-सत्कार के योग्य घर की शोभारूपिणी ये स्त्रियाँ और लक्ष्मी (या-लक्ष्मियाँ = शोभाएँ) घरों में समान हैं (जिस प्रकार शोभा के बिना घर सुन्दर नहीं लगता उसी प्रकार स्त्री के बिना भी घर सुन्दर नहीं लगता, अतः श्री तथा स्त्री में कोई भेद नहीं।
सन्तानोत्पादन, उत्पन्न हुई सन्तान की रक्षा (पालन-पोषण) और प्रतिदिन के लोक-व्यवहार (अतिथि मित्रादि-भोजनादिरूप गृहप्रबन्ध) का मुख्य कारण स्त्रियाँ ही हैं।
सन्तान (को उत्पन्न करना), धर्मकृत्य (अग्निहोत्री यज्ञादि कार्य), शुश्रूषा (पति, सास-श्वसुरादि गुरुजनो की सेवा) श्रेष्ठ रति और पितरों का तथा अपना (सन्तानोत्पादनादि द्वारा) स्वर्ग - ये सब स्त्रियों के अधीन हैं।
जो (स्त्री) मन, वचन तथा काय (शरीर) को संयत रखती हुई पति का उल्लङ्घन (अनादर या परपुरुष-सम्भोग) नहीं करती; वह (मर कर) पतिलोकों को पाती है तथा (जीती हुई) इस लोक में सज्जनों से पतिव्रता कही जाती है।
स्त्री परपुरुष के संसर्ग से इस लोक में निन्दित होती है, (मरकर) शृगाल की योनि पाती (स्यारिन होती) है और (कुष्ठ आदि) पाप रोगों से पीड़ित होती है।
(महर्षियों से भृगुजी कहते हैं कि) श्रेष्ठ (मनु आदि) तथा प्राचीन महर्षियों ने पुत्र के विषय में सर्वहितकारी एवं पवित्र जो विचार कहा है, उसे (आप लोग) सुनें!
पुत्र पति (भर्ता) का होता है (ऐसा मुनि लोग) मानते हैं, पति के विषय में दो प्रकार की श्रुति है (उनमें से पहली श्रुति यह है कि) कुछ मुनि पुत्रोत्पादक अविवाहित पति को भी उस पुत्र से पुत्री (पुत्रवाला) मानते हैं (तथा दूसरी श्रुति यह है कि) अन्य (मुनि लोग) विवाहकर्त्ता (परन्तु स्वयं पुत्रोत्पादन नहीं करनेवाले पति) को (अन्य पुरुषोत्पादित) पुत्र से पुत्री (पुत्रवाला) मानते हैं ।
स्त्री क्षेत्ररूप (धान्य बोने के खेततुल्य) है और पुरुष बीजरूप (धान्यादि के बीजतुल्य) है। क्षेत्र तथा बीज (स्त्री-पुरुष) के संसर्ग से सब प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
कहीं पर बीज प्रधान है और कहीं पर क्षेत्र प्रधान है जहाँ पर बीज तथा क्षेत्र (पुरुष तथा स्त्री-दोनों समान हैं अर्थात्‌ उन दोनों के मध्य में तीसरा कोई नहीं है। वह सन्तान श्रेष्ठ मानी जाती है।
बीज तथा क्षेत्र में बीज ही श्रेष्ठ कहा जाता है। अतएव सब जीवों की सन्तान बीज के लक्षणों से युक्त ही उत्पन्न होती है।
समय पर जोते तथा सींचे गये खेत में जैसा (जिस जातिवाला) बीज बोया जाता है, अपने गुणों से वह बीज उस खेत में वैसा (अपनी जाति के समान) ही उत्पन्न होता है।
यह भूमि भूत (क द्वारा आरब्ध वृक्ष, लता, गुल्म आदि) की नित्य (अनादि कालगत) क्षेत्ररूप कारण कही गयी है, किन्तु कोई बीज योनि (क्षेत्र अर्थात्‌ खेत) के किन्ही गुणों को अपने अङ्कुर आदि में धारण नहीं करता; (अतएव योनि (क्षेत्र अर्थात्‌ खेत) के गुण का बीज के द्वारा अनुवर्तन नहीं होने से क्षेत्र की प्रधानता नहीं होती है)।
भूमि में किसानों के द्वारा एक खेत में भी समय-समय पर बोये गये (विभिन्न जातीय) बीज अपने-अपने स्वभाव के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपवाले उत्पन्न होते हैं (भूमिका एक रूप होने पर भी बीजों का एक रूप नहीं होता, अत एव बीज को ही प्रधान मानना चाहिये।
ब्रीहि (साठी धान), शालि (अगहनी धान), मूँग, तिल, उड़द, यव, लहसुन तथा गन्ना ये (अनेक प्रकार के) बीज खेत में उत्पन्न होते हैं।
दूसरा (बीज) बोया गया और दूसरा (उससे भिन्न) ही उत्पन्न हो गया, ऐसा कभी भी नहीं हुआ, किन्तु जो बीज बोया जाता है, वही बीज उत्पन्न होता है।
इस कारण से विद्वान्, विनीत ज्ञान (वेद) तथा विज्ञान (वेदाङ्गादि सब शास्त्र) का ज्ञाता और आयुष्य चाहनेवाले पुरुष को पर-स्त्री में बीजवचन (सम्भोग द्वारा वीर्यपात) कभी नहीं करना चाहिये।
पूर्वकाल के ज्ञाता लोग इस विषय में वायु की कही गयी गाथा (वचन) कहते हैं कि पुरुष को परस्त्री में कभी नहीं बीज बोना (सम्भोग द्वारा वीर्य निषेक करना) चाहिए।
जिस प्रकार किसी शिकारी या व्याध के द्वारा मारे गये मृग शरीर के उसी (पूर्व शिकारी से विद्ध) स्थान में दूसरे शिकारी या व्याध का बाण नष्ट हो जाता है अर्थात् उस मृग को पाने का अधिकार पहले शिकारी या व्याधा को ही होता है, दूसरे को नहीं उसी प्रकार परस्त्री में छोड़ा गया बीज (वीर्य) शीघ्र ही नष्ट हो जाता है; (क्योंकि उससे उत्पन सन्तान को पाने का अधिकार वीर्य निषेक करने वाले को नहीं होता, अपितु उस क्षेत्र (स्त्री) के पति को होता है, अतएव परस्त्री सम्भोग नहीं करना चाहिये।
पुरावित् (प्राचीन इतिहास के ज्ञाता महर्षि आदि) लोग इस पृथ्वी को पृथु की भार्या मानते हैं। खुत्थ (ठुठ पेड़) काटने (पर भूमि को समतल करके खेत बनाने) वाले का खेत मानते हैं और पहले बाण मारने वाले का मृग मानते हैं।
केवल पुरुष कोई वस्तु नहीं होता अर्थात् अपूर्ण ही रहता है, किन्तु स्त्री, स्वदेह तथा सन्तान - ये तीनों मिलाकर ही पुरुष (पूर्णरूप) होता है, ऐसा (वेदज्ञाता) ब्राह्मण कहते हैं। और जो पति है वही स्त्री है, अतएव उस स्त्री में (परपुरुष से भी) उत्पन्न सन्तान उस स्त्री के पति की ही होती है।
'बेचने या त्याग करने से स्त्री पति के स्त्रीत्व से मुक्त नहीं होती' पहले ब्रह्मा के बनाये हुए ऐसे धर्म को हम जानते हैं। (अतएव पति स्त्री को छोड़ दे या द्रव्य लेकर बेच दे तब भी उस स्त्री में परपुरुषोत्पादित सन्तान पति की ही होती है; सन्तानोत्पादक दूसरे पति की नहीं)।
पिता पुत्रादि के हिस्से को एक बार ही बाँटता है (उसे बार-बार बदलता नहीं), कन्या एक ही बार (पिता आदि के द्वारा पति के लिए) दी जाती है (फिर उसे पति आदि कोई भी व्यक्ति द्रव्य लेकर या बिना द्रव्य लिए दूसरे को नहीं दे सकता अर्थात् विवाहकर्ता पति आदि कोई भी उस स्त्री को न तो बेच सकता है न त्यागकर दूसरे के लिए है, उसे ही दे ही सक्ता है) और 'गौ आदि को देता हूँ' ऐसा वचन एक ही बार कहा जाता है (दान की हुई गौ को बार-बार दान नहीं किया जा सकता)। सज्जनों के तीनों दान कार्य एक हो बार होते हैं, अनेक बार नहीं।
जिस प्रकार गाय, घोड़ी, ऊँटिनी, दासी, भैंस, बकरी और भेंड़ में उत्पत्र सन्तान को पाने का अधिकारी सन्तानोत्पादक. नहीं होता (किन्तु उक्त गाय आदि का स्वामी ही होता है), उसी प्रकार दूसरे पुरुष की स्त्रियों में उत्पादित सन्तान को पाने का अधिकारी (उन स्त्रियों का) पति ही होता है; (उत्पत्र करने वाला दूसरा पुरुष नहीं)।
जो क्षेत्र (खेत) का स्वामी नहीं होकर भी दूसरे के क्षेत्र में बीज बोते हैं, वे उस (क्षेत्र) में उत्पन्न होने वाले अन्न के फल को कहीं (किसी देश आदि में) भी नहीं पाते हैं।
जो दूसरों की गाय में साँड़ सैकड़ों बछड़ों को उत्पन्न कर दे, वे सब बछड़े गाय के स्वामी के ही होते हैं (और साँड़ के स्वामी के नहीं होते, अतः) साँड़ का वीर्यक्षरण करना व्यर्थ है।
उसी प्रकार (स्त्रीरूप) क्षेत्र का स्वामी नहीं होते हुए जो पुरुष दूसरे के (स्त्रीरूपी), क्षेत्र में बीज बोते (वीर्यक्षरण) करते हैं, वे बीजवाला (परस्त्री में वीर्यक्षरण करने वाला पुरुष, सन्तानरूपी) फल को नहीं प्राप्त करता।
खेतवाला और बीज बोनेवाला ये दोनों परस्पर में फल उत्पन्न होने के कारण अन्न-फल आदि के विषय में नियम (इस खेत में तुम्हारे बीज होने पर जो अन्न उत्पन्न होगा, वह हम दोनों का होगा, ऐसी शर्त) नहीं करे तो उस खेत में उत्पन्न (अन्न-फल आदि) खेत वाले का होता है; क्योंकि बीज की अपेक्षा क्षेत्र (खेत) ही प्रधान है (यही नियम सन्तानोत्पत्ति के विषय में भी जानना चाहिये)।
खेत का स्वामी बीज बोने वाले से नियम (इस खेत में तुम्हारे बीज बोने पर उत्पन्न अन्नादि हम दोनों का होगा, ऐसी शर्त) करके जो खेत देता है, इस लोक में उस उत्पन्न अन्नादि का स्वामी दोनों-खेत के स्वामी तथा बीज बोने वाले के होते देखा गया है।
पानी या हवा के वेग से (दूसरे के खेत में बोया गया) जो बीज बहकर या उड़कर दूसरे के खेत में जाता (अङ्कुरित होता) है, वह बीज (उस बीज का फल) खेत (जिसमें बीज जाता है, उस खेत) के स्वामी का ही होता है, बीज बोने वाला उसका कुछ भी फल (लाभ) नहीं पाता।
यही (९/४९-५४ में कथित) व्यवस्था गाय, घोड़ा दासी, बकरी, भेड़, पक्षी और भैंस की सन्तान के प्रति भी जाननी चाहिये।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि मैंने) बीज तथा क्षेत्र की प्रधानता और अप्रधानता को तुम लोगों से कहा - इसके बाद आपत्ति में (सन्तान नहीं होने पर) स्त्रियों के धर्म को कहूँगा।
बड़े भाई की स्त्री छोटे भाई की गुरुपत्नी (के तुल्य) होती है और छोटे भाई की स्त्री बड़े भाई की स्नुषा (पुत्र वधू अर्थात् पतोहू के तुल्य) होती है।
(अतएव) बड़ा भाई छोटे भाई की स्त्री (भवह) के साथ तथा छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री (भौजाई) के साथ आपत्तिकाल के बिना नियुक्त होने पर भी सम्भोग करके पतित हो जाते हैं।
सन्तान के अभाव होने पर पति या गुरु से नियुक्त (आज्ञप्त) स्त्री को देवर (पति का छोटा भाई) या सपिण्ड के साथ (९/६०) श्लोक में वर्णित विधि के अनुसार) सन्तान प्राप्त करना चाहिये।
विधवा स्त्री में पति या गुरु से नियुक्त देवर या सपिण्ड पुरुष सम्पूर्ण शरीर में घी लगाकर तथा मौन होकर रात में (सम्भोग करके, एक पुत्र को उत्पन्न करे, द्वितीय पुत्र को कदापि उत्पत्र नहीं करे)।
नियोग से पुत्रोत्पादन विधि के ज्ञाता कुछ आचार्य 'अपुत्र एकपुत्रः' अर्थात् 'एक पुत्र वाला पुत्रहीन है' इस शिष्ट वचन के अनुसार) एक पुत्र की उत्पत्ति होने से नियोग के उद्देश्य की पूर्णता नहीं मानकर दूसरे पुत्र को उत्पन्न करने के लिए भी उन्हें (देवर या सपिण्ड के पुरुष को) अनुमति देते हैं।
विधवा (९।६० का विमर्श देखें) में नियोग के उद्देश्य (गर्भधारण आदि) के विधिवत् पूरा हो जाने पर (बड़े भाई तथा छोटे भाई की स्त्री से क्रमशः) गुरु तथा स्नुषा (पुत्रवधू) के समान परस्पर बर्ताव करे।
जो नियुक्त छोटा या बड़ा भाई परस्पर की स्त्री के साथ विधि (९८६० में वर्णित समस्त अङ्गों में घृतलेपन, मौन तथा रात्रिकाल) को छोड़कर कामवशीभूत हो सम्भोग करते हैं, वे दोनों (बड़ा भाई तथा छोटा भाई क्रमशः) स्नुषासम्भोग तथा गुरुपत्नी-सम्भोग के पापभागी होकर पतित हो जाते हैं।
ब्राह्मणादि (गुरु या पति आदि) विधवा (९।६० का विमर्श देखे) को दूसरे (देवर या सपिण्ड पुरुष) में नियुक्त न करे अर्थात् सन्तान न होने पर भी सन्तानोत्पादन करने की देवर आदि को आज्ञा न दे, क्योंकि दूसरे (देवर या सपिण्ड पुरुष) में स्त्री को नियुक्त करते हुए (वे ब्राह्मणादि) सनातन धर्म को नष्ट करते हैं।
विवाह सम्बन्धी किन्हीं मन्त्रों में किसी भी शाखा में नियोग को नहीं कहा गया है और न विवाह की विधि में विधवा को पुनः देने (दूसरे पुरुष के साथ पुनर्विवाह करने) को ही कहा गया है।
राजा वेन के शासनकाल में मनुष्यों के लिए भी कहे गये इस पशु धर्म की विद्वान् द्विजों ने निन्दा की है।
समस्त पृथ्वी का पालन करते हुए राजर्षिप्रवर वेन ने काम से नष्ट बुद्धि होकर मनुष्यों को) भाई की स्त्री के साथ सम्भोग का नियम चालू कर) वर्ण सङ्कर बनाया।
तब ('वेन' शासन-काल) से जो मनुष्य मृत पति वाली विधवा स्त्री को सन्तान के लिए (देवर आदि के साथ) मोह वश नियुक्त करता है; उसकी सज्जन लोग निन्दा व्करते हैं।
वाग्दान करने के बाद जिस कन्या का पति मर जाय, उस कन्या के साथ उसका अपना देवर (उसी मृत पति का छोटा सहोदर भाई) इसके आगे (९।७०) कथित विधि से विवाह (उस कन्या को प्राप्त) करे।
वह देवर (वाग्दत्त कन्या के मृत पति का सहोदर छोटा भाई) विधिपूर्वक इसे स्वीकारकर (कायिक, वाचिक और मानसिक) शुद्धिवाली उस (वाग्दत्ता मृतपति कन्या) के साथ प्रत्येक ऋतुकाल में १-१ बार गर्भ धारण होने तक सम्भोग करे।
चतुर (शास्त्रज्ञानी मनुष्य) कन्या का किसी के लिए वाग्दानकर उस पति के मर जाने पर पुनः उस कन्या के लिए दे; क्योंकि उक्त कन्या को दूसरे पति के लिए देता हुआ वह 'पुरुषानृत' दोष को प्राप्त करता है और 'सहस्रं त्वेव चोत्तमः' (८।१३८) में कथित दण्ड का भागी होता है।
विधि (३।३५) के अनुसार कन्या को ग्रहणकर भी विधवा के लक्षणों से युक्त, रोगिणी, क्षतयोनि (या शापादि) दोष से युक्त अथवा (अधिकाङ्गी या होनाङ्गी होने पर भी उस दोष को छिपाकर) कपटपूर्वक दी गयी कन्या को द्विज सप्तपदी होने के पहले छोड़ दे।
जो (कन्या का पिता, भ्राता या अन्य अभिभावक आदि) दोषयुक्त कन्या को (उसका दोष नहीं कहकर) दान करता है, कन्या-दान करने वाले उस दुरात्मा के दान को (वर) व्यर्थ कर दे अर्थात्‌ वैसी कन्या को ग्रहण करना अस्वीकार कर दे।
आवश्यक कार्य वाला मनुष्य स्त्री को जीविका (भोजन, वस्त्र आदि) का प्रबन्ध कर प्रवास करे (दूसरे देश या नगर आदि को जाय); क्योंकि जीविका के अभाव से पीड़ित शीलवती भी स्त्री (परपुरुष-संसर्ग आदि से) दूषित हो जाती है।
जीविका (भोजन, वस्त्र आदि) का प्रबन्ध कर पति के परदेश जाने पर स्त्री नियम पालती (शृङ्गार, परगृहगमन आदि का त्याग करती) हुई जीए तथा (भोजन, वस्त्र आदि का) प्रबन्ध किये विना ही पति के परदेश चले जाने पर स्त्री अनिन्दित शिल्प (सीना, पिरोना, सूत कातना आदि कार्यों) से जीए।
स्त्री धर्मकार्यार्थ परदेश गये हुए पति की आठ वर्ष तक, विद्या (पढ़ने) या (विद्यादि गुण-प्रचार के द्वारा) यश के लिए परदेश गये हुए पति की छः वर्ष तक और भोग आदि अन्य साधनों के लिए परदेश गये हुए पति की तीन वर्ष तक प्रतीक्षा करे (इसके बाद वह स्त्री पति के पास चली जावे)।
पत्नी अपने (पति के) साथ द्वेष करने वाली स्त्री की एक वर्ष तक (उसके सुधार द्वेष त्याग के लिए) प्रतीक्षा करे, इसके बाद उसके लिए दिये गये भूषण आदि को उससे लेकर उसके साथ सहवास करने का त्याग कर दे, (किन्तु आभरण लेकर भी उसके भोजन वस्त्र की व्यवस्था तो करे ही)।
जो स्त्री (जुआरी आदि होने से) प्रमादयुक्त, (मदपान आदि से) मतवाले तथा रोग से पीड़ित पति की उपेक्षा (सेवा आदि न) करे, पति उसका भूषण आदि लेकर तीन माह तक त्याग कर दे (उसके साथ सहवाह न करे)।
(वायु आदि के दोष से) उन्मत्त (पागल), पतित (११।१७०-१७८) नपुंसक, निर्वीर्य (जिसका वीर्य स्थिर नहीं रहे) और पापरोगी (कोढ़ी आदि) की सेवा नहीं करनेवाली स्त्री का पति न तो त्याग करे और न उसके धन या भूषण आदि का ही ग्रहण करे।
(निषिद्ध) मद्यपान करनेवाली, दुराचारवाली (पति के) प्रतिकूल रहने वाली, (कुष्ठ यक्ष्मा आदि) रोगवाली, (दास-दासी आदि को सदा) मारने या फटकारनेवाली और अधिक धन-व्यय करनेवाली स्त्री हो पति उसके जीवित रहने पर भी दूसरा विवाह कर ले।
सन्तान-हीन स्त्री की आठवें वर्ष में, मृत-सन्तान स्त्री की दसवें वर्ष में कन्या को ही उत्पादन करने वाली स्त्री की ग्यारहवें वर्ष में और अप्रियवादिनी स्त्री की तत्काल उपेक्षा करके जीवित रहने पर भी पति दूसरा विवाह कर ले।
जो स्त्री रोगिणी हो परन्तु पति की हिताभिलाषिणी तथा शीलवती हो, पति उससे सम्मति लेकर दूसरा विवाह करे तथा उसका अपमान कदापि न करे।
उक्त (९1८०-८१) अवस्था में पति के दूसरा विवाह करने पर जो स्त्री कुपित होकर घर से निकल जाय (या निकलना चाहे) तो पति उसे (क्रोध शान्त होने तक रस्सी आदि से) बाँधकर रोके अथवा पिता आदि के पास पहुँचा कर छोड़ दे।
जो (क्षत्रिया आदि) स्त्री (पति आदि स्वजनों के) मना करने पर भी विवाहादि उत्सवों में भी (निषिद्ध मद्य का पान करे अथवा सबके सामने नाचने गाने आदि में सम्मिलित हो) तब राजा उसे ६ कृष्णल (रत्ती) सुवर्ण से दण्डित करे।
यदि द्विज सजातीय (समान जातिवाली) तथा विजातीय (भिन्न जातिवाली) स्त्रियो के साथ विवाह कर ले तो उनके वर्ण-क्रम के अनुसार भाषण, दान, (भाग हिस्सा), वस्त्र-आभूषण आदि से सत्कार तथा (निवास के लिए) घर होते हैं अर्थात्‌ उच्च वर्ण वाली पत्नी के लिए श्रेष्ठ तथा हीनवर्ण वाली पत्नी के लिए उसकी अपेक्षा हीन वे सब प्राप्त होते हैं।
उन (सजातीय तथा विजातीय स्त्रियों) में भोजन आदि देकर पतिक सेवा तथा नित्य (भिक्षादान, अतिथिभोजन, अग्निहोत्रकर्म आदि) धर्म कार्य सजातीय (समान जातिवाली ही) स्त्री करे, अन्य जातिवाली स्त्री कदापि न करे।
जो पति सजातीय (समान जातिवाली) स्त्री के सन्निहित रहने पर मोहवश विजातीय (दूसरी जातिवाली) स्त्री द्वारा शरीर-सेवादि कार्य करवाता है, वह ब्राह्मण चाण्डाल (ब्राह्मणी स्त्री में शूद्र पति से उत्पन्न पुत्र के तुल्य) प्राचीन ऋषियों द्वारा देखा (माना) जाता है।
(कुल तथा आचार में) श्रेष्ठ, सुन्दर और योग्य वर मिल जाय तो (पिता या अन्य अभिभावक आदि) कन्या की अवस्था (आयु) विवाह योग्य न होने पर भी अर्थात्‌ 'दक्ष' के वचनानुसार आठ वर्ष से कम आयु रहने पर भी उस कन्या को उस वर के लिए ब्राह्मविधि (३।३७) से दान (विवाहित) कर दे।
ऋतुमती भी कन्या जीवनपर्यन्त पिता घर में भले ही रह जाय, (किन्तु पिता आदि अभिभावक) इसे (ऋतुमती भी कन्या को) गुणहीन वर के लिए कदापि न देवे।
कन्या ऋतुमती होने पर तीन वर्ष तक (पिता आदि के योग्यतर पति के लिए दान करने की) प्रतीक्षा करे, इसके बाद (योग्यतर पति नहीं मिलने पर) समान योग्यता वाले भी पति को स्वयं वरण कर ले।
(पिता आदि के द्वारा किसी योग्यतर) वर के लिए नहीं दान करने पर जो (ऋतुमती कन्या ऋतुकाल से तीन वर्ष तक प्रतीक्षा कर अपनी समान योग्यतावाले) पति का स्वयं वरणकर लेती है तो वह कन्या तथा पति थोड़ा भी दोषभागी नहीं होते हैं।
उक्त नियम (९।९०) के अनुसार पति का स्वयं वरण करनेवाली कन्या पिता, भाई, माता (या अन्य किसी अभिभावक) के दिये हुए अलङ्कारों को न लेवे, (किन्तु उन्हें वापस लौटा दे), यदि वह (पिता आदि के दिये हुए अलङ्कार को) लेती है तो चोर होती है।
ऋतुमती कन्या को ग्रहण (उसके साथ विवाह) करनेवाला पति (कन्या के) पिता के लिए धन न देवे; क्योंकि वह पिता ऋतु (के कार्यरूप सन्तानोत्पादन) के रोकने से (उस कन्या के) स्वामित्व से हीन हो जाता है।
तीस वर्ष की अवस्था वाला पति बारह वर्ष की अवस्था वाली सुन्दरी कन्या के साथ विवाह करे, अथवा (गार्हस्थ्य धर्म के सङ्कटावस्था में रहने के कारण से) शीघ्रता करने वाला चौबीस वर्ष की अवस्था वाला पति आठ वर्ष की कन्या के साथ विवाह करे।
पति (सूर्य आदि) देवों के द्वारा ही दी गयी स्त्री को प्राप्त करता है, अपनी इच्छा से नहीं प्राप्त करता, अतएव (उन) देवों का प्रिय करता हुआ (वह पति) उस सदाचारिणी स्त्री का अन्न, वस्त्र तथा आभूषण आदि से सर्वदा पोषण करे।
गर्भ-ग्रहण करने के लिए स्त्रियों की तथा गर्भाधान करने के लिए पुरुषों की सृष्टि हुई है, इस कारण वेद में अग्न्याधान आदि साधारण धर्म भी (गर्भधारण तथा गर्भाधान के समान) पुरुष का स्त्री के साथ ही कहा गया है (अतः पुरुष का कर्तव्य है कि वह स्त्री का अन्न-वस्त्र तथा आभूषण आदि से पोषण करे।
कन्या का मूल्य (उसके पिता आदि को) देकर (विवाह के पहले ही) यदि पति मर जाय तो उस कन्या की अनुमति होने पर उसे (उसके) देवर के लिए दे देना चाहिये।
कन्या-दान करता हुआ (शास्त्र-ज्ञान हीन) शूद्र भी (मूल्य आदि रूप में कोई) धन पति से न लेवे (जब शूद्र तक के लिए निषेध है तो द्विज को तो कन्या का मूल्य कदापि नहीं लेना चाहिए); क्योंकि पति से धन लेता हुआ (पिता आदि कन्याभिभावक) छिपकर कन्या को बेचता है।
महर्षि भृगुजी मुनियों से कहते हैं कि) कन्या को दूसरे के लिए देने का वचन देकर पुन: वह किसी दूसरे के लिए दे दी जाय, ऐसा न तो किसी पुराने सज्जन ने किया और न वर्तमान में ही कोई सज्जन करता है।
(महर्षि भृगुजी मुनियों से पुन: कहते हैं कि) पूर्वजन्मों में भी यह नहीं सुना कि "शुल्क" नामक मूल्य से किसी सज्जन ने कभी भी गुप्तरूप से कन्या को बेचा हो।
मरण-पर्यन्त स्त्री-पुरुष का परस्पर में व्यभिचार अर्थात्‌ धर्मार्थकाम-विषयक कार्ये में पार्थक्य (अलगाव) न होवे, यही संक्षेप में स्त्री-पुरुष का धर्म जानना चाहिये।
(अतएव) विवाह किये हुए स्त्री-पुरुष को ऐसा यत्न करना चाहिये कि वे परस्पर में (धर्मार्थकाम-विषयक कार्यों में) कभी पृथक्‌ न हो।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि) मैंने आप लोगों से रति (स्नेह-अनुराग) युक्त स्त्री-पुरुष के धर्म तथा उनके आपत्काल में सन्तान-प्राप्ति के विधान को कहा, (अब आप लोग) दायभाग (पिता आदि के धन के विभाजन-बँटवारा) को सुनें।
माता-पिता के मरने पर सब भाई एकत्रित होकर पैतृक (पितृ-सम्बन्धी) सम्पत्ति को बराबर बाँट लें; क्योंकि (वे पुत्र) उन दोनों (माता-पिता) के जीवित रहते सम्पति लेने में असमर्थ रहते हैं।
अथवा बड़ा भाई ही पिता के सब-धन को प्राप्त करे और अन्य छोटे भाई पिता के समान उन बड़े भाई से भोजन-वस्त्र आदि पाते हुए जीवें अर्थात्‌ उसी के साथ में सम्मिलित होकर रहें । (ज्येष्ठ भाई के धार्मिक एवं भ्रातृवत्सल होने पर ही ऐसा हो सकता है।
मनुष्य ज्येष्ठ पुत्र की उत्पत्ति मात्र से (उसके संस्कार युक्त नहीं होने पर भी) त्रवान्‌ हो जाता है और पितृक्रण से छूट जाता है; अतएव वह (ज्येष्ठ-पुत्र) पिता का सब सम्पत्ति पाने योग्य है।
पिता जिस पुत्र के उत्पन्न होने से पितृ-ऋण से छूट जाता है और अमृतत्व को प्राप्त करता है, वही (ज्येष्ठ-पुत्र) धर्म से उत्पन्न है, अन्य (शेष-छोटे पुत्र) कामवासना से उत्पन्न हैं, ऐसा (मुनि लोग) मानते हैं (अतएव वही ज्येष्ठ पुत्र पिता की सम्पूर्ण सम्पत्ति का अधिकारी होने के योग्य है)।
ज्येष्ठ भाई छोटे भाइयों का पालन पिता के समान करे तथा छोटे भाई ज्येष्ठ भाई में धर्म के लिए पुत्र के समान वर्ताव करें अर्थात्‌ ज्येष्ठ भाई को पिता मानें।
धर्मात्मा ज्येष्ठ (भाई) ही कुल की उन्नति करता है अथवा अधर्मात्मा होकर कुल का) नाश करता है । गुणवान्‌ ज्येष्ठ भाई संसार में पूज्य तथा सज्जनों से अनिन्दनीय होता है।
यदि ज्येष्ठ भाई (छोटे भाईयों के साथ) ज्येष्ठ के अर्थात्‌ पिता आदि के समान (लालन-पालन आदि उत्तम) वर्ताव करे तो वह (छोटे भाइयों के द्वारा) माता-पिता के समान पूज्य है तथा यदि (वह ज्येष्ठ भाई छोटे भाइयों के साथ) ज्येष्ठ के समान वर्ताव न करे तो उसके साथ (छोटे भाईयों को) बन्धु (मामा आदि बन्धुजन) के तुल्य व्यवहार करना चाहिये।
इस प्रकार (९।१०५-११०) वे (छोटे भाई) एक साथ रहें अथवा धर्म की इच्छा से अलग-अलग रहें । अलग-अलग रहने से (पञ्जमहायज्ञादि कार्य सब भाइयों को अलग-अलग ही करने के कारण!) धर्मबुद्धि होती है, अतएव भाइयों को अलग-अलग रहना भी धर्मयुक्त है।
पिता के सम्पूर्ण धन में से ज्येष्ठ भाई का बीसवाँ भाग तथा श्रेष्ठ पदार्थ (चाहे वह एक ही हो) कनिष्ठ (सबसे छोटे भाई का अस्सीवाँ भाग और मध्यम (मझिला) भाई का चालीसवाँ भाग उद्धार होता है।
(यदि तीन से अधिक भाई हो तो) सबसे बड़े और छोटे भाई का 'उद्धार' क्रमशः बीसवाँ तथा अस्सीवाँ भाग और अन्य मध्यम (मझिला; सझिला आदि) भाइयों का चालीसवाँ भाग 'उद्धर' भागर पितृधन में निकालना चाहिये। पहले ही पूर्ववर्णित क्रम से निकालकर शेष धन का समान-समान भाग सब भाइयों को प्राप्तव्य होता है।
सम्पूर्ण सम्पत्तियों से श्रेष्ठ वस्तु ज्येष्ठ भाई को मिलती है, यदि एक ही श्रेष्ठ वस्तु हो तो भी वह उसे ही मिलती है तथा दश-दश गाय आदि पशुओं में से एकएक श्रेष्ठ गाय आदि उस ज्येष्ठ भाई को मिलती है।
सब छोटे भाइयों के अपने-अपने कर्मों में युक्त रहने पर पूर्वश्लोकोक्त दशदश गाय आदि पशुओं में से एक-एक गाय आदि पशु “उद्धार” रूप में ज्येष्ठ भाई को नहीं प्राप्तव्य होता; किन्तु ज्येष्ठ भाई के मान को बढ़ाने के लिए उसे कुछ भी अधिक भाग देना चाहिये।
इस प्रकार (९।११२-११५) सबके उद्धार (अतिरिक्त भाग विशेष) को पृथक्‌ कर (शेष धन-राशि को) समान भाग कर ले; "उद्धार" पृथक्‌ नहीं करने पर भाइयों के भाग की कल्पना इस (९1११७) प्रकार करे।
(पितृ-धन-राशि में से) ज्येष्ठ भाई दो भाग, उससे छोटा भाई डेढ भाग तथा उससे (या तीन भाई से अधिक होने पर छोटा) भाई एक भाग ले; यह व्यवस्थित धर्म है।
अपने-अपने भाग का चतुर्थांश भाग (अविवाहित सोदर्या) बहनों के लिए (ब्राह्मणादि चारों वर्ण के) भाई देवें। यदि वे (उन बहनों के विवाह-संस्कारार्थ) चतुर्थांश नहीं देना चाहिते हैं तो वे पतित होते हैं।
बकरा (खस्सी), भेंड तथा घोड़ा आदि के विषम होने (भाइयों में समान भाग नहीं विभाजित हो सकने) पर वह बड़े भाई का ही भाग होता है, उसे विषम नही किया जाता अर्थात्‌ समान भाग करने के लिए उसे बेचकर या उसके बराबर धन को सब भाइयों में नहीं विभाजित किया जाता।
यदि छोटा भाई श्रेष्ठ भाई की स्त्री में नियोग' (९।५९-६२) द्वारा पुत्र उत्पन्न करे तो वह (क्षेत्रज) पुत्र अपने चाचाओं के बराबर ही भाग पाने का अधिकारी होता है अर्थात्‌ उसके भाई के पुत्र होने के कारण वह 'उद्धार' (९।११२-११४) अर्थात्‌ अतिरिक्त भाग का अधिकारी नहीं होता, ऐसी धर्म की व्यवस्था है।
उपसर्जन (छोटे भाई के द्वारा ज्येष्ठ भाई की स्त्री में नियोग (९।५९-६१) से उत्पन्न अप्रधान) पुत्र धर्मानुसार प्रधान (साक्षात्‌ पिता के द्वारा उत्पन्न पुत्र के भाग। 'उद्धार' (९।११२-११४) अर्थात्‌ अतिरिक्त भाग को) पाने का अधिकारी नहीं होता; क्योंकि अपने क्षेत्र (स्त्री) में सन्तान उत्पन्न करने में पिता ही मुख्य है, अत: धर्म से उस पुत्र को पितृव्यों के साथ पूर्व वचन के अनुसार समान भाग लेना चाहिए।
यदि बड़ी (प्रथम विवाहिता) स्त्री का पुत्र छोटा हो तथा छोटी (बाद में विवाहित) स्त्री का पुत्र बड़ा हो तो वहाँ (“माताओं के विवाह क्रम से उन पुत्रों की बड़ाई छोटाई का विचार होगा या पुत्रों के जन्मक्रम से होगा?” ऐसा सन्देह उपस्थित होने पर) विभाजन (धन का बँटवारा) किस प्रकार किया जाय अर्थात्‌ किस पुत्र को बड़ा तथा किस पुत्र को छोटा मानकर पितृ-धन को भाइयों में बाटा जाय एवं किस पुत्र का कितना 'उद्धार' (९।११२-११४) हो ऐसा सन्देह हो तो-
पहली (प्रथम विवाहिता) स्त्री का छोटा पुत्र (पितृ-सम्पत्ति में से) एक श्रेष्ठ बैल उद्धार? (अतिरिक्त भाग--९।११२-११४) लेवे, इसके बाद उससे बचे जो श्रेष्ठ बैल हैं उनमें से एक-एक बैल अपनी माता (विवाह के) क्रम से उत्पन्न पुत्र लेवें।
ज्येष्ठ (प्रथम विवाहित) माता में उत्पन्न (जन्मकालानुसार भी) ज्येष्ठ पुत्र प्रन्द्रह गायों के साथ एक बैल ले, तदनन्तर शेष स्त्रियो में उत्पन्न पुत्र माताओं के विवाहक्रम से बचे हुए धन में से अपना-अपना भाग लें।
समान (एक) जातिवाली स्त्रियों से उत्पन्न सन्तानों में जाति सम्बन्धी विशेषता नहीं होने से माता के क्रम से ज्येष्ठत्व नहीं होता; किन्तु जन्म (के क्रम) से ही ज्येष्ठत्व कहा जाता है।
(इन्द्र के आह्वान के लिए प्रयुक्त होने वाले) “सुब्रह्मण्या' नामक मन्त्र में भी जन्म से ही ज्येष्ठत्व कहा गया है तथा गर्भ के एक काल में आधान होने पर भी यमज सन्तानों भी जन्म ही ज्येष्ठत्व कहा गया है।
पुत्र-हीन पिता कन्या-दान करते समय - "इस कन्या से जो पुत्र होगा वह मेरी श्राद्धादि पारलौकिक क्रिया करनेवाला होगा" ऐसा जामाता (जमाई-दामाद) से कहकर उस कन्या को 'पुत्रिका' करे।
अपने वंश की वृद्धि के लिए दक्ष प्रजापति ने पुरातन काल में इस विधि से 'पुत्रिका' की थी।
प्रसन्न आत्मा वाले उस (दक्ष प्रजापति) ने (वस्र-अलङ्कार आदि से) अलंकृत कर धर्मराज के लिए दस, कश्यप के लिए तेरह और सोम (चन्द्रमा) के लिए सत्ताईस कन्याओं को दिया था।
('आत्मा वै पुत्रनामासि’ इत्यादि श्रुतिवचनों से) पुत्र पिता की आत्मा है जैसा पुत्र है, वैसी ही पुत्री भी है, (अतएव) आत्म-स्वरूप उस (पुत्री) के वर्तमान रहने पर दूसरा ((दायाद आदि, मरे हुए पिता की) सम्पत्ति को कैसे लेगा (अतएव 'पुत्रिका' को ही मरे हुये पिता के धन लेने का अधिकार न्याय प्राप्त है, दूसरे को नहीं)।
माता का (विवाहादि-काल में पिता या माता आदि से प्राप्त हुआ) धन उसकी कन्या (अविवाहित पुत्री) का ही भाग होता है तथा पुत्रहीन नाना के सब धन को दौहित्र (धंवता, नाती अर्थात्‌ पूर्व (९।१ २७) वचनानुसार 'पुत्रिका' की गयी कन्या का पुत्र) ही प्राप्त करता है।
नाती (“पुत्रिका" (९।१२७) का पुत्र) ही दूसरे पुत्र के नहीं रहने पर पिता का भी सब धन प्राप्त करे और वही अपने पिता तथा नाना के लिए दो पिण्ड देवे।
संसार में पौत्र (पुत्र का पुत्र = पोता) तथा दौहित्र (धेवता, नाती अर्थात्‌ 'पुत्रिका' (९।१२७) से पुत्र) में कोई भेद नहीं हैं; क्योंकि उन दोनों के माता-पिता उसी के शरीर से उत्पन्न हुए हैं।
'पुत्रिका' (९।१२७) करने के बाद यदि किसी को पुत्र उत्पन्न हो जाय तो उन दोनों (पुत्रिका-पुत्र अर्थात्‌ धेवता तथा पौत्र अर्थात्‌ पोतो) को समान भाग मिलते हैं क्योंकि ज्येष्ठ होने पर भी 'उद्धार' (९-१११-११२) अर्थात्‌ अतिरिक्त भाग निकालने में ज्येष्ठत्व नहीं होता।
किसी प्रकार (दुर्भाग्य आदि के कारण से) विना पुत्र उत्पन्न किये ही 'पुत्रिका’ (९।१२७) आदि मर जाय तो उसके पिता (श्वसुर) के धन को 'पुत्रिका' का पति ही निःसन्देह होकर ग्रहण करे।
'पुत्रिका’ (९।१२७) की गयी अथवा नहीं की गयी पुत्री के गर्भ से समान जाति वाले पति के द्वारा उत्पन्न पुत्र से ही नाना पुत्रवान्‌ होता है, (अतएव) वह (पुत्र) ही नाना के लिए पिण्डदान करे तथा पुत्र उसका सब धन प्राप्त करे।
(पिता) पुत्र से स्वर्ग आदि उत्तम लोकों को प्राप्त करता है, पौत्र (पुत्र के पुत्र--पोते) से उन लोकों में अनन्तकाल तक निवास करता है तथा प्रपौत्र (पुत्र के पौत्र परपोते) से सूर्य लोक को प्राप्त करता है।
जिस कारण पुत्र “पु” नामक नरक से पिता की रक्षा करता है, उस कारण से स्वयं ब्रह्मा ने उसे 'पुत्र' कहा है।
संसार में पौत्र (पोता-पुत्र के पुत्र) तथा दौहित्र (धेवता-पुत्री के पुत्र) में भेद नहीं सिद्ध होता; क्योंकि दौहित्र भी पौत्र के समान ही इस (नाना) का परलोक में उद्धार कर देता है।
पुत्रिका-पुत्र (नाती-धेवता अर्थात्‌ पुत्रिका-पुत्र, श्राद्ध करते समय) पहला पिण्ड माता के लिए, दूसरा पिण्ड उसके पिता (अपने नाना) के लिए और तीसरा पिण्ड माता के पितामह (अपने परनाना) के लिए दे।
जिसका दत्तक पुत्र सब गुणों से युक्त हो, परन्तु अन्य गोत्र से आया हो, तथापि वह पिता के धन को पाता ही है।
दत्तक पुत्र अपने पिता (जिससे उसका जन्म हुआ है) के गोत्र तथा धन कहीं भी नहीं प्राप्त करता है, इसलिए पुत्र को दूसरे के लिए देते हुए (उत्पन्न करने वाले) पिता के गोत्र तथा धन सम्बन्धी स्वधा (श्रद्धादि-कर्माधिकार) नष्ट हो जाते हैं।
अनियोग (९।५९-६१) से उत्पन्न अथवा पुत्रवती स्त्री में नियोग (गुरु आदि की आज्ञा से देवरादि से) उत्पन्न पुत्र क्रमशः जार तथा कामवासना से उत्पन्न होने से पितृ धन के भागी नहीं होते हैं।
नियुक्त (गुरु आदि की आज्ञा प्राप्त की हुई) स्त्री में भी विधिहीन (९।५९६१ के अनुसार घृताक्त आदि न होकर) उत्पन्न किया गया पुत्र पितृ-धन का भागी नहीं होता है; क्योंकि वह (९।६३ के अनुसार) पतित से उत्पन्न हुआ है।
नियुक्त (९1५९-६१) स्त्री से उत्पन्न पुत्र औरस पुत्र के समान पिता के धन का भागी होता है; क्योंकि वह क्षेत्रज (स्त्री का बीज) है और धर्मानुसार सन्तान भी है।
निःसन्तान मरे हुए (बड़े) भाई के धन तथा स्त्री की जो भाई रक्षा करे, वह (छोटा भाई अर्थात्‌ उस स्त्री का देवर) नियोग (९।५९-६०) धर्म से स्त्री में सन्तान उत्पन्न करके मृत भाई का सब धन उसी पुत्र को दे देवे।
कामवशीभूत जो स्त्री नियोग (९।५९-६१) से दूसरे (सपिण्ड व्यक्ति) या देवर से पुत्र प्राप्त करे, उस पुत्र को मनु आदि महर्षि कामजन्य, पितृधन का अनधिकारी और वृथोत्पन्न बतलाते हैं।
(भृगुमुनि ऋषियों से कहते हैं कि) समान जातिवाली स्त्रियों में एक पति से उत्पन्न पुत्रों का यह (९।१०३-१४७) विभाग-विधान (बटवारे का नियम) जानना चाहिये। जब अनेक जातियों वाली बहुत-सी स्त्रियों में उत्पन्न पुत्रों के विभाग (हिस्से) को (आपलोग) ज्ञात करें।
यदि ब्राह्मण (पति) की ब्राह्मणी आदि चारों वर्णो (ब्राह्मणी, क्षत्रिया, वैश्या तथा शूद्रा) की स्त्रियाँ हों तो उनमें उत्पन्न पुत्रों का यह (९।१५०-१५५) में कहा जानेवाला) विभाग का विधान है।
ब्राह्मणी में उत्पन्न पुत्र के लिए खेती करने योग्य एक बैल, (या हल तथा बैल), सवारी (घोड़ा आदि), भूषण, घर, इनमें से जो श्रेष्ठ हो, उनको सब भागों में से एक भाग देना चाहिये।
(पूर्व (९-१५०) वचनानुसार "उद्धार” भाग करने के बाद बचे हुए पितृ धन में से) तीन भाग ब्राह्मणी का पुत्र, दो भाग क्षत्रिय का पुत्र, डेढ़ भाग वैश्या का पुत्र और एक भाग शाद्रा का पुत्र पाता है।
अथवा सम्पूर्ण (पूर्व (९/१५०) के अनुसार 'उद्धार' भाग निकालने पर (बचे हुए) पितृ धन के दश भागकर धर्मज्ञाता पुरुष (९/१५३) इस प्रकार से विभाजन करे।
पूर्वोक्त वचनानुसार दश भाग किये गये पितृ-धन में से चार भाग ब्राह्मणौ का पुत्र, तीन भाग क्षत्रिय का पुत्र, दो भाग वैश्य का पुत्र और एक भाग शूद्र का पुत्र लेवे।
(ब्राह्मण यद्यपि समान जातिवाली स्त्रियों में उत्पन्न पुत्रवाला हो या पुत्रहीन हो; किन्तु धर्मानुसार शूद्रापुत्र के लिए दशमांश से अधिक धन पिता ब्राह्मण न देवे।
ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य पिता से धन का भागी शूद्र स्त्री में उत्पन्न पुत्र नहीं होता किन्तु इसका पिता जो कुछ इसके लिए दे देता है, वही इस (शूद्र के पुत्र) का धन होता है।
द्विजाति (ब्राह्मण, क्षत्रिया तथा वैश्य) की समान जातिवाली स्त्रियो में उत्पन्न पुत्र बड़े भाई के लिए उद्धार (९।११२-११५).के अनुसार अतिरिक्त भाग) देकर पिता के शेष धन को बराबर-बराबर ले लेवें।
शूद्र की स्त्री शूद्र ही होती है दूसरी (श्रेष्ठ वर्ण की या नीच जातीय) नहीं तथा उस (शूद्र स्त्री) में यदि सौ पुत्र भी उत्पन्न हों तो वे सब समान ही भाग (पितृ-धन में से) प्राप्त करते हैं अर्थात्‌ पूर्व (९।११२-११५) कथित 'उद्धार' भाग उनमें से ज्येष्ठ पुत्र के लिए पृथक्‌ नहीं दिया जाता।
(महर्षि भृगुजी मुनियों से कहते हैं कि) ब्रह्मा के पुत्र मनु ने मनुष्यों के जिन बारह पुत्रों को (९।१५९-१६०) कहा है; उनमें से प्रथम ६ पुत्र दायाद (पितृ-धन के भागी) तथा बान्धव (तिलोदक देने के अधिकारी)-दोनों ही होते हैं और अन्तिम ६ पुत्र केवल बान्धवमात्र है।
औरस, क्षेत्रज, दत्तक, कृत्रिम, गूढोत्पन्न तथा अपविद्ध - ये ६ प्रकार के पुत्र दायाद (पितृधन के भागी) तथा बान्धव (पिण्डोदक देने अर्थात्‌ श्राद्ध एवं तर्पण करने वाले) होते हैं।
कानीन (कान्या-पुत्र), सहोढ, क्रीत, पौनर्भव (विधवा-पुत्र), स्वयंदत्त तथा शौद्र (शूद्रा-पुत्र) - ये ६ प्रकार के पुत्र दायाद (धन के भागी) नहीं हें किन्तु बान्धव (तिलोदकादि देने के अधिकारी हैं)।
तृण आदि की बनी हुई दूषित नाव से पानी को पार करता हुआ मनुष्य जैसा फल पाता है वैसा ही फल (क्षेत्रज आदि) कुपुत्रो के द्वारा अन्धकार (रूप पारलौकिक दुःख) को पार करता हुआ पाता है (अतएव क्षेत्रजादि पुत्र औरस पुत्र के समान सम्पूर्ण कार्य करने में समर्थ नहीं होते; बल्कि पारलौकिक दु:ख को पार करने में औरस पुत्र ही समर्थ होता है)।
यदि एक व्यक्ति के धन के अधिकारी औरस तथा क्षेत्रज - दोनों ही पुत्र हों तो वह धन जिसके पिता का है, वही अर्थात्‌ औरस पुत्र ही ग्रहण करे दूसरा अर्थात्‌ क्षेत्रज पुत्र नहीं।
केवल औरस पुत्र ही पिता के धन का स्वामी होता है, शेष (क्षेत्रज पुत्र को छोड़कर बाकी दत्तक आदि) पुत्रों को दोषनिवृत्ति के लिए भोजन-वस्त्र आदि (खोरिश के रूप में) देना चाहिये।
पिता के धन में से विभाजन (बँटवारा) करता हुआ औरस पुत्र, क्षेत्रज पुत्र का षष्ठांश या पञ्चमांस दे देवे।
(बारह प्रकार (९।१५९-१६०) के पुत्रों में से) केवल औरस तथा क्षेत्रजग्ये दो ही पुत्र पिता के धन के भागी होते हैं, शेष दस प्रकार के पुत्र तो क्रमशः गोत्र के समान पितृधन के भागी होते हैं।
विधिपूर्वक विवाहित समान जातिवाली स्त्री में पुरुष स्वयं जिस पुत्र को उत्पन्न करता है, उसे मुख्य (सब प्रकार के पुत्रों में प्रधान) “औरस" पुत्र जानना चाहिये।
मरे हुए, रोगी अथवा नपुंसक पुरुष की स्त्री में नियोग विधि! (९।५९६२) से उत्पन्न पुत्र 'कषेत्रज' कहा गया है।
माता या पिता (ग्रहण करनेवाले) समान जातिवाले जिस पुत्र को (पुत्र के अभावरूप) आपत्तिकाल में प्रेमपूर्वक (भय या लोभ से नहीं) जल के साथ अर्थात्‌ संकल्प कर देते हैं, उसे 'दत्त्रिम' (दत्तक, दत्त) पुत्र जानना चाहिये।
मनुष्य, गुण तथा दोष (समान जाति वाले माता-पिता के श्राद्ध आदि पारलौकिक क्रिया करना गुण तथा नहीं करना दोष) को जानने वाले एवं (माता-पिता आदि की) सेवा आदि कार्य से युक्त समान जाति वाले जिस पुत्र को अपना पुत्र मान लेता है, वह "कृत्रिम" पुत्र कहा जाता है।
जिसके घर में स्त्री को पुत्र उत्पन्न हो तथा “यह पुत्र समान जातिवाला है' ऐसा ज्ञात होते हुए भी “किससे उत्पन्न हुआ है?” यह मालूम नहीं हो; इस प्रकार गुप्त रूप से घर में उत्पन्न वह पुत्र जिस स्त्री से उत्पन्न होता है उसी के पति का 'गूढ' पुत्र कहा जाता है।
माता-पिता (दोनों) या माता या पिता (किसी एक) द्वारा त्यक्त जिस पुत्र को मनुष्य स्वीकार कर लेता है, वह 'अविविद्ध' पुत्र कहा जाता है।
पितृ-गृह में रहती हुई कन्या (अविवाहित पुत्री) गुप्तरूप से जिस पुत्र को उत्पन्न करती है, उसे 'कानीन' पुत्र कहते हैं, तथा वह पुत्र कन्या के साथ विवाह करने वाले पति का होता है।
ज्ञातावस्था (जानकारी) में या आज्ञातावस्था (अजानकारी) में जिस गर्भिणी कन्या का विवाह किया जाता है, उस गर्भ से उत्पन्न पुत्र विवाहकर्त्ता पति का होता है तथा उस पुत्र को "सहोढ" पुत्र कहते हें।
माता-पिता को मूल्य देकर समान जाति वाले या असमान जाति वाले जिस पुत्र को अपना पुत्र बनाने के लिए मनुष्य खरीदता है, खरीदे हुए पुत्र को 'क्रित' पुत्र कहते हैं।
पति से छोड़ी गयी या विधवा स्त्री अपनी इच्छा से दूसरे को पति बनाकर जिस पुत्र को उत्पन्न करती है, उसे 'पौनर्भव' पुत्र कहते हैं।
यदि अक्षतयोनि वह स्त्री दूसरे पति के पास जावे और द्वितीय पति विवाह कर ले, अथवा कुमारावस्था वाले पति को छोड़कर दूसरे पति के पास जाकर पुनः प्रथम पति के पास जाने पर स्त्री के साथ वह प्रथम कुमार पति विवाह कर ले; तो वह उसकी 'पुनर्भू' स्त्री कहलाती है।
माता-पिता से हीन अथवा उनसे निष्कारण त्यक्त (छोड़ा गया) पुत्र जिस पुरुष के लिए (पुत्ररूप होकर) अपने को समर्पण कर दे, वह उस पुरुष का "स्वयंदत्त" पुत्र कहलाता है।
ब्राह्मण स्व-विवाहिता शूद्र में जिस पुत्र को उत्पन्न करता है, वह जीता हुआ भी मरे हुये के समान होने से "पाराशव" पुत्र कहलाता है।
दासी (८।४१५) में, दासी की दासी में जो पुत्र शूद्र से उत्पन्न होता है, वह पिता से “तुम भी विवाहित स्त्री के पुत्रों के बराबर धन का भाग (हिस्सा) लो" इस प्रकार आज्ञा पाकर (पितृ-धन का) बराबर भाग लेने वाला होता है, ऐसी धर्म की व्यवस्था है।
इन क्षेत्रज? आदि ("औरस" पुत्र को छोड़कर शेष (९।१६९-१७८) ग्यारह प्रकार के पुत्रों का “श्राद्ध" आदि क्रिया का अभाव न हो” इसलिए मुनियों ने पुत्र (औरस' पुत्र) का प्रतिनिधि कहा है।
('औरस” पुत्र के वर्णन के) प्रसङ्ग में दूसरे के वीर्य से उत्पन्न जो ये (क्षेत्रज आदि पुत्र ९।१५९-१७८) कहे गये हैं, वे जिसके वीर्य से उत्पन्न होते हैं। उसी के हैं, दूसरे (क्षेत्रिक के) नहीं; (अतः “औरस” पुत्र (९।१५८) तथा 'पुत्रिका' (९।१२) के विद्यमान रहने पर उस क्षेत्रजादि पुत्रों को नहीं करना चाहिये)।
एक माता तथा पिता अर्थात्‌ सहोदर भाइयों में से यदि एक भाई को पुत्र हो तो उसी से (पुत्रहीन भी) अन्य सभी भाई पुत्रवान्‌ होते हैं ऐसा मनु ने कहा है।
एक पतिवाली स्त्रियो में से यदि एक स्त्री को पुत्र उत्पन्न हो जाय तो (पुत्रहीन शेष भी सब स्त्रियाँ) उसी पुत्र से पुत्रवती होती है, ऐसा मनु ने कहा है।
(पूर्वोक्त ९।१४९-१६०) बारह प्रकार के पुत्रों में से उत्तम-उत्तम पुत्र के अभाव में हीन-हीन पुत्र (पिता के) धन का भागी होता है और सबके समान गुणी होने पर समान धन पाने के अधिकारी होते हैं।
(पिता के) धन पाने का अधिकारी सहोदर भाई या पिता नहीं होते; किन्तु 'औरस' पुत्र (९।१६६) के अभाव में क्षेत्र' आदि पुत्र (९।१६६-१७६) ही पिता के धन पाने का अधिकारी होता है पुत्र (मुख्य पुत्र तथा स्त्री और कन्या) से हीन पुरुष के धन का भागी पिता या भाई होते हैं।
तीन (पिता, पितामह और प्रपितामह) का उदक (तर्पण, तिलाझलिदान) करना चाहिये और तीन का ही पिण्डदान (श्राद्ध) होता है; चौथा इनको देनेवाला होता है, इनके साथ पाँचवें किसी का कोई सम्बन्ध नहीं होता।
सपिण्डो में निकट सम्बन्धी मृतव्यक्ति के धन का भागी (हकदार) होता है तथा इसके बाद (सपिण्ड के अभाव में) क्रमश: समानोदक (सजातीय), आचार्य तथा शिष्य मृतव्यक्ति के धन का भागी होता है।
सब (औरस पुत्र, पत्नी, सपिण्ड आदि) के अभाव में वेदत्रय (ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद) के पढ़ने वाले, शुद्ध (शरीर सम्बन्धी ब्राह्म शुद्धि तथा मनः सम्बन्धी आभ्यन्तर शुद्धि से युक्त), जितेन्द्रिय ब्राह्मण ही मृत व्यक्ति के धन पाने के अधिकारी होते हैं, इस प्रकार धर्म (मृत व्यक्ति के पिण्डदानादि क्रिया) की हानि नहीं होती है।
ब्राह्मण के धन को राजा कदापि (मृत ब्राह्मण के धन लेने वाले औरस पुत्रादि के किसी के नहीं रहने पर भी) नहीं लेवे यह शास्त्र मर्यादा है । दूसरे (क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) वर्णो के धन को सब (औरस पुत्रादि) उत्तराधिकारी किसी भी व्यक्ति के नहीं रहने पर राजा ग्रहण करे।
सन्तानहीन मृत पति की स्त्री नियोग धर्म (९।५९-६२) के द्वारा सगोत्र से पुत्र उत्पन्न करे तथा मृत पति का जो-जो धन हो, उसे उस पुत्र के लिए दे देवे।
दो पिताओं से उत्पन्न दो पुत्र स्त्री (माता) के धन के विषय में विवाद करे तो जो पुत्र जिस पिता से उत्पन्न हुआ है, वह पुत्र उसी (अपने ही) पिता के धन पाने का अधिकारी होता है, दूसरा पुत्र नहीं।
माता के मरने पर सब सहोदर भाई तथा अविवाहित सहोदरी बहनें उसके धन को बराबर भाग में पाती है।
उन (सहोदरी) पुत्रियों की जो अविवाहित पुत्रियाँ (पोतियाँ) हों, उनके सम्मानार्थ भी नानी के धन में से कुछ भाग उनके लिए प्रेमपूर्वक देना चाहिये।
(१) विवाह काल में अग्निसाक्षित्व के समय पिता आदि के द्वारा दिया गाया, (२) पिता के घर से पति के घर लायी जाती हुई कन्या के लिए दिया गया, (३) फ्रेम-सम्बन्धी किसी सु-अवसर पर पति आदि के द्वारा दिया गया तथा (४) भाई, (५) माता और (६) पिता के द्वारा विविध अवसरों पर दिया गया छ: प्रकार का धन 'स्त्री-धन' कहलाता है।
विवाह के बाद पति कुल में या पितृ कुल में प्राप्त हुए स्त्री के धन को पाने का अधिकारी उसके पति के जीवित रहने पर भी पुत्रियों को ही होता है।
ब्राह्म, दैव, आर्ष, गान्धर्व और प्राजापत्य संज्ञक (क्रमशः ३।२७, २८, २९, ३०) और ३२ विवाहों से प्राप्त सन्तानहीना स्री के पूर्वोक्त (९।१९४) छः प्रकार बके धन का अधिकारी पति ही होता है ऐसा मनु आदि का मत है।
आसुर आदि (आसुर, राक्षस तथा पैशाच, क्रमश: ३।३१, ३३ और ३४) संज्ञक विवाहों में स्त्री के लिए जो धन दिया गया हो, सन्तानहीन उस स्त्री के मरने पर पूर्वोक्त (९।१९४) ६ प्रकार के स्त्री-धन को पाने के अधिकारी उसके माता-पिता होते हैं।
ब्राह्मण की अनेक जातिवाली सन्तान हीन क्षत्रियादि वर्णोवाली स्त्रियो के मरने पर उसके पिता आदि के द्वारा दिये गये पूर्वोक्त (९।१९४) छः प्रकार के ख्री-धन को पाने का. अधिकार सजातीय या विजातीय सपत्नियों की सन्तान रहने पर भी ब्राह्मण जातीया सपत्नी की कन्या को ही होता है और उसके अभाव में उसकी (पुत्री) को अधिकार प्राप्त होता है।
स्त्री-भाई आदि बहुत परिवार वाले धन में से तथा अपने पति के धन में से भी पति की आज्ञा के बिना अलङ्कार आदि के लिए धन का संग्रह न करे (अतएव उक्त धन 'स्त्री-धन' नहीं होता है।
पति के जीवित रहने पर स्त्रियाँ जिन भूषणों को पहनती हों, उनको भाई आदि हिस्सेदार न लेवें, यदि वे उन्हें लेते हैं तो वे पतित हो जाते हैं।
नपुंशक, पतित, जन्मान्ध, बहरा, पागल, जड़, गूँगा और जो किसी इन्द्रिय से शून्य (लँगड़ा, लूला आदि) हों, वे धन के भागी (हिस्सेदार) नहीं होते हैं, (किन्तु भोजन वस्त्रमात्र पाते रहने के अधिकारी होते हैं।
सब (पूर्व श्लोकोक्त नपुंसक आदि) के धन को न्यायपूर्वक लेने वाला शास्त्रज्ञ विद्वान्‌ उन (नपुंसक-पतित आदि) के लिए भोजन-वस्त्र यथाशक्ति देवे और नहीं देने वाला पतित होता है।
इन नपुंसक, पतित आदि (९।२०१) को किसी प्रकार विवाह करने की इच्छा हो तो (इनके विवाह होने पर) उत्पन्न (नपुंसक की क्षेत्रज तथा पतितादि की औरस) सन्तान उनके धन पाने की अधिकारिणी होती है।
पिता के मरने के बाद यदि बड़ा भाई अपने पुरुषार्थ से धनोपार्जन करे तो उस धन में पढ़े-लिखे छोटे भाइयों का भाग होता है (मूर्खो का नहीं)।
बिना पढ़े लिखे सब भाइयों के प्रयत्न (खेती, व्यापार आदि) से यदि धन प्राप्त हो तब पितृ-धन को छोड़कर उस प्रयत्नोपार्जित धन में से ज्येष्ठ भाई का उद्धार (अतिरिक्त भाग) नहीं होता, (किन्तु पिता के धन में से ही वह उद्धार भाग होता है) ऐसा शास्त्रीय निर्णय है।
विद्या से, मित्र से, विवाह में और मधुपर्क के समय पूज्यता के कारण जिसको जो धन प्राप्त हो; वह धन उसी का होता है।
भाइयों में से अपने उद्योग में समर्थ जो भाई पिता के धन से भाग लेना नहीं चाहे, तब सब भाई पिता के धन में से कुछ भाग देकर उसे अलग कर दें।
पिता के धन को नष्ट नहीं करता हुआ यदि कोई पुत्र केवल अपने पुरुषार्थ (व्यापार आदि) से उपार्जित धन में से किसी के लिए कुछ नहीं देना चाहे तो वह (अपने पुरुषार्थ से उपार्जित धन में से) किसी को कुछ नहीं देवे।
पिता अपनी असामर्थ्य के कारण उपेक्षित जिस पैतृक धन को नहीं पा सका है, उस (पैतामहिक) धन को यदि पुत्र अपने पुरुषार्थ से प्राप्त कर ले और उसमें से दूसरे भाइयों को भाग नहीं देना चाहे तो न देवे।
पहले कभी अलग हुए भाई पुन: सम्मिलित होकर एकत्र रहने लगें और फिर कभी अलग होना चाहें तो उस समय तक भाइयों का समान भाग होता है, बड़े भाई का 'उद्धार' (९।११२-११५) अर्थात्‌ अतिरिक्त भाग नहीं मिलता है।
जिन भाइयों में से बड़ा या छोटा भाई (विदेश जाने या संन्यासी होने आदि के कारण) भाग से रहित हो जाय अर्थात्‌ अपना भाग नहीं पावे या मर जाय तो उसके १ भाग का लोप (नाश) नहीं होता है।
(किन्तु उसके पिता, माता, स्त्री या पुत्र नहीं हों तो) सब सहोदर भाई और बहनें तथा सपत्नी-पुत्रों (सौतेले भाइयों) में से जो सम्मिलत रहते हों, सभी मिलकर उसके भाग में से समान-समान भाग परस्पर में बाँट लें।
जो ज्येष्ठ भाई लोभ से छोटे भाइयों को ठगे (पिता के धन में से उन्हें उचित भाग न दे या कम दे), वह ज्येष्ठ भाई के आदर को नहीं पाता, उसका :उद्धार' (अतिरिक्त भाग--९।११२-११५) भी नहीं मिलता तथा वह राजा के द्वारा दण्डनीय होता है।
(पतित नहीं होने पर भी) शास्त्रविरुद्ध (जुआ खेलना, मद्य पीना, वेश्यागमन करना आदि) करनेवाले सभी भाई पिता के धन के भागी (हकदार) नहीं होते हैं तथा ज्येष्ठ भाई छोटे भाइयों के भाग को बिना पृथक्‌ किये अपने लिए कुछ भी धन (पिता के धन में से) नहीं लेवे।
यदि सम्मिलित रहते हुये सब भाई साथ में ही धनोपार्जन करें तो पिता किसी प्रकार भी किसी पुत्र को अधिक भाग को कदापि न देवे।
पिता के जीवित रहते ही उन पुत्रों की इच्छा से उनमें धन का विभाजन (बँटवारा) होने पर यदि कोई पुत्र उत्पन्न हो तो वह पुत्र पिता के मरने पर उसके धन का भागी होता है तथा यदि कुछ भाई विभाजन होने पर भी पिता के साथ मिलकर रहने लगें तो बाद में उत्पन्न पुत्र पिता के मरने पर उसके साथ मिलकर रहने वाले भाइयों के साथ सभी धन में से समान भाग प्राप्त करता है।
सन्तानहीन पुत्र के धन को माता लेवे तथा मर गयी हो तो पिता को माता (दादी) लेवे।
पिता के धन तथा ऋण का विधिपूर्वक विभाजन (बँटवारा) करने के बाद यदि पिता का कोई धन या उसके द्वारा लिया हुआ ऋण शेष रह गया हो तो उसको सब भाई बराबर-बराबर बाँट लें (उस धन में से ज्येष्ठ भाई को उद्धार अर्थात्‌ अतिरिक्त (९।११२-११५) नहीं मिलेगा।
वस्त्र, वाहन, आभूषण, पक्वान्न; जल (कूप आदि सार्वजनिक जलस्थान स्त्रियाँ (दासियाँ), मन्त्री, पुरोहित आदि योगक्षेमसाधक मार्ग इनको (मनु आदि महर्षि) विभाज्य मानते हैं।
(महर्षि भृगुजी मुनियों से कहते हैं कि मैंने) आप लोगों से वह विभाजन का विधान तथा (क्षेत्रज आदि) पुत्रों के भाग (हिस्से) का प्रकार क्रमश: कहा, अब आप लोग द्यूतकर्म को सुनिये।
राजा के अपने राज्य से द्यूत तथा समाहृय (९।२२३) को दूर करना चाहिये; क्योंकि ये दोनों दोष राजा के राज्य को नष्ट करने वाले हैं।
द्यूत तथा समाहृय (९।२१३) ये दोनों ही प्रत्यक्ष में चोरी करना (डाका डालना) है अतएव उनको रोकने में राजा को सर्वदा प्रयत्नशील रहना चाहिये।
बिना प्राणी (कौड़ी, पाशा, तास, तीर आदि की निशानेबाजी तथा सट्टा आदि के द्वारा बाजी लगाकर खेलना धूत (जुआ) तथा प्राणियों (मुर्गा, तीतर, बटेर आदि एवं भेड़ा आदि को लड़ाकर तथा कुत्ता, घोड़ा आदि दौड़ाकर-कुत्तारेस, घोड़ारेस आदि) के द्वारा बाजी लगाकर खेलना 'समाह्य' कहलाता है।
जो मनुष्य द्यूत तथा समाह्य (९।२२३) खेलें या खेलावें, उनको तथा यज्ञोपवीत आदि ब्राह्मण के चिह्लों को धारण करने वाले शूद्रों को (राजा) हाथ आदि कटवाकर दण्डित करे।
जुआरियों (जुआ खेलने या खेलाने वाले), कुशीलवों (नाचने-गाने वाले), वेद-शा्र के विरोधियों, पाखण्डियों (श्रुति-स्मृति में अकथित व्रतादि धारण करने वाले), आपत्तिकाल नहीं होने पर भी दूसरों की जीविका करने वाले और मद्य बनाने वाले मनुष्यों को राजा राज्य से शीघ्र ही बाहर निकाल दे।
राज्य में रहने वाले गुप्त और चौर - ये (पूर्व श्लोकोक्त कितव आदि) विरुद्धाचरण से सज्जन प्रजाओं को पीड़ित करते रहते हैं।
(केवल इस समय में ही नहीं किन्तु) पूर्वकाल में भी यह द्यूत (जुआ) बड़ा विरोधकारक देखा गया है, इस कारण बुद्धिमान मनुष्य हँसी-मजाक के लिए भी द्यूत का सेवन न करे।
जो छिपकर या प्रकट रूप में द्युत (जुआ) खेलता है, उसके लिए राजा की जैसी इच्छा होती है, उसी के अनुसार दण्ड होता है।
राजा के द्वारा दण्डित क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र दण्डद्रव्य (जुर्माना) देने में असमर्थ हो तो राजा उनसे काम कराकर दण्डद्रव्य की पूर्ति (वसूली) करे। ब्राह्मण यदि दण्ड द्रव्य देने में असमर्थ हो तो राजा उससे धीरे-धीरे दण्डड्रव्य (जुर्माना) को ग्रहण करे (किन्तु ब्राह्मण से काम कराकर दण्डद्रव्य की पूर्ति न करावे)।
स्त्री, बालक, उन्मत्त (पागल), वृद्ध, दरिद्र और रोगी मनुष्यों को पेड़ों की (जड़) या बाँस से मारकर या रस्सी से बाँधकर राजा दण्डित करे (इनपर अर्थदण्ड अर्थात्‌ जुर्माना न करे)।
राजा के द्वारा कार्य में नियुक्त जो राजाधिकारी पुरुष घूस आदि के धन की गर्मी (घमण्ड) से कार्य को नष्ट कर दें तो राजा उनकी सम्पत्ति को अपने अधीन कर ले।
कपटपूर्वक राजाज्ञा लिखने वाले, प्रकृति (मन्त्री, सेनापति आदि परिजनों) को फोड़ने वाले तथा स्त्री, बालक और ब्राह्मणों की हत्या करने वालो एवं शत्रु का सेवन करने वालों का वध करके दण्डित करे।
जिस किसी व्यवहार (मुकदमे) में जो शासन-व्यवस्था के अनुसार निर्णीत कर लिया गया हो और जो दण्डविधमान कर दिया गया हो; उसे धर्मपूर्वक किया हुआ जानना चाहिये और उसमें (निष्कारण) परिवर्तन नहीं करना चाहिये (तथा किसी कारण-विशेष के होने पर तो परिवर्तन भी करना ही चाहिये)।
मन्त्री या न्यायाधीश (जज आदि राजाधिकारी) जिस कार्य को ठीक (न्यायपूर्वक) नहीं किये हों, उस कार्य को राजा स्वयं करे और उन्हें सहस्र पण (८।१३६) से दण्डित करे।
(१) ब्राह्मण की हत्या करनेवाला, (२) मद्य पीनेवाला ('पेष्टी' मद्य को पीने वाला) द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) और 'पेष्टी-माध्वी-गोडी' (क्रमशः आटा, महुआ तथा गुड़ से बने हुए) मद्य को पीने वाला ब्राह्मण, (३) (ब्राह्मण के सुवर्ण को) चुराने वाला एवं (४) गुरुपत्नी के साथ सम्भोग करने वाला और पृथक्‌-पृथक्‌ कर्म करने वाले इन सबको महापातकी जानना चाहिये।
राजा प्रायश्चित नहीं करने वाले इन चारों प्रकार के महापातकियों को शारीरिक तथा अपराधानुसार आर्थिक दण्ड से धर्मानुसार (आगे (९।२३७-२४०) कहे गये दण्ड से) दण्डित करे।
गुरुपत्नी के साथ सम्भोग करने वाले (के ललाट) में भग का चिह्न, मद्य पीने वाले (के ललाट) में सुरापात्र का चिह्न, ब्राह्मण के सुवर्ण को चुराने वाले (के ललाट) में कुत्ते के पैर का चिह्न तथा ब्राह्मण की हत्या करने वाले (के ललाट) में शिरकटे मनुष्य को चिह्न (तपाये हुए लोहे से) करा देवे।
(ये चतुर्विध (९।२३५) महापातकी) असम्भोज्य (अन्न आदि खिलाने के अयोग्य), असंयाज्य (यज्ञादि सत्कर्म कराने के अयोग्य), असम्पाठ्य (पढ़ाने के अयोग्य) अविवाह्य (विवाह के अयोग्य), समस्त धर्म-(कार्या) से बहिष्कृत एवं दीन होकर पृथ्वी पर घूमा करें।
उक्त (९।२३७) चिह्नों से चिह्नित ये जाति वालों तथा (मामा आदि) सम्बन्धियों से त्याज्य हैं, दया के अयोग्य हैं और नमस्कार के अयोग्य है; ऐसा मनु का आदेश है।
शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त करने वाले इन सब वर्णो के ललाट में राजा (तपाये लोहे से) चिह्न न करे, किन्तु उत्तम साहस (८।१३८-१०० पणों) से दण्डित करे।
इन (९।२३५) अपराधों को अकामपूर्वक करने वाले गुणवान्‌ ब्राह्मण को मध्यम साहस (५०० पण) से दण्डित करना चाहिए तथा सकाम होकर करने पर धनधान्यादि के सम्पत्ति तथा साधनों के साथ देश से निकाल देना चाहिये।
अकामपूर्वक इन (९।२३४) अपराधों को करने वाले क्षत्रियों, वैश्यों व शुद्रों को सर्वस्व हरणकर दण्डित करे तथा कामपूर्वक अपराध करने वाले इनको वधरूप दण्ड दे।
धर्मात्मा राजा महापातकियों (९।२३५) से धन को नहीं ग्रहण करे, लोभ से उनके धन को ग्रहण करता हुआ राजा उस (महापातक) दोष से युक्त होता है।
(अतएव) राजा उन महापातकियों से लिये गये धन को पानी में डालकर वरुण के लिए दे देवे अथवा शास्त्र तथा सदाचार से युक्त विद्वान्‌ ब्राह्मण के लिए दे देवे।
क्योंकि महापातकियों (९।२३५) के अर्थदण्ड को ग्रहण करनेवाला स्वामी वारुण है, अतएव वही राजाओं के भी अर्थदण्ड को ग्रहण करनेवाला है तथा वेदपारङ्गगत (एवं सदाचारी) ब्राह्मण सम्पूर्ण संसार का स्वामी है, (इस कारण उन महाफातकियो के धन को) वे ही दोनों (वरुण या वेदपारङ्ग सदाचारी ब्राह्मण ही) ग्रहण करने के अधिकारी हैं।
जिस राज्य में राजा महापातकियों (९।२३५) के धन को दण्डरूप में भी नहीं लेता है (अपितु “अप्सु प्रवेश्य.......(९।२४४) के अनुसार पानी में डाल देता या सदाचार-सम्पन्न वेदपारगामी ब्राह्मण के लिए दे देता है), उस राज्य में यथा समय मनुष्य उत्पन्न होते हैं, वे दीर्घजीवी होते हैं।
वैश्यों (कृषकों) के द्वारा खेती में बोये गये बीज यथावत्‌ पृथक्‌-पृथक्‌ उत्पन्न होते हैं, (अकाल में) बालक नहीं मरते हैं और कोई प्राणी विकृत (किसी अङ्ग से हीन या विकारयुक्त) नहीं उत्पन्न होता है।
जान-बूझकर (शरीर-पीड़ा तथा धन आदि चुराकर) ब्राह्मण को पीड़ित करने वाले शूद्र को राजा उद्रेगकारक विचित्र बधों (हाथ-पैर आदि को काटने) से मार डाले।
अवध्य (नहीं मारने योग्य) को वध करने में जितना अधर्म होता है, उतना ही अधर्म (अपराध के कारण) वध करने योग्य व्यक्ति को छोड़ने में राजा को होता है और शाख्रानुसार दण्डित करने वाले राजा का धर्म देखा जाता है (अत: राजा दण्डनीय व्यक्ति को अवश्य दण्डित करे)।
(महामुनि भृगुजी मुनियों से कहते हैं कि मैंने) परस्पर विवाद करते हुए वादी तथा प्रतिवादियों (मुद्दई तथा मुद्दालहों) के अठ्ठारह प्रकार के (८।४-७) विवादों में व्यवहार (मुकदमे) के निर्णय को विस्तारपूर्वक कहा।
धर्मयुक्त कार्यो को इस प्रकार अच्छी तरह करता हुआ राजा अप्राप्त देशों को प्राप्त करने की इच्छा कर तथा प्राप्त हुए देशों का यथावत्‌ पालन करे।
राजा पूर्व (७।६९) कथित सस्यादि-सम्पन्न देश का आश्रयकर वहाँ दुर्ग (७।७०) में वर्णित दुर्गों में से किसी एक प्रकार का दुर्ग-किला) बनवाकर कण्टकों (चोरों तथा साहस कर्म करनेवाले अर्थात्‌ आग लगाने वाले डाका डालने वाले आदि व्यक्तियों) को दूर करने में सर्वदा अच्छी तरह प्रयत्न करता रहे।
सदाचारियों की रक्षा तथा कण्टकों (चोरों तथा साहस कर्म करने वालों, आग लगाने वालों या डाका डालने वालों आदि) के शोधन (दण्डितकर नष्ट) करने से प्रजापालन में तत्पर राजा (मरने पर) स्वर्ग को जाते हैं (अतएव आर्यरक्षण तथा कण्टकशोधन में राजा को प्रयत्नशील रहना चाहिये)।
जो राजा चौर आदि का शासन नहीं करता हुआ, प्रजाओं से कर भाग-विशेष (टैक्स) लेता है, उसके राज्य में निवास करने वाले लोग क्रुद्ध हो जाते हैं तथा वह राजा स्वर्ग पाने के अधिकार से हीन हो जाता है।
जिस राजा के बाहुबल के आश्रय से राज्य (चौर आदि से) निर्भय होता है, उस राजा का राज्य सीचे गये वृक्ष के समान वृद्धि को पाता है।
(गुप्तचरों के द्वारा सब काम देखने से) चारचक्षुष्‌ (गुप्तचर ही हैं नेत्र जिसके ऐसा) राजा गुप्त (छिपकर) तथा प्रकाश (प्रकट) रूप में दूसरों के धन को चुराने वाले दो प्रकार के चोरों को मालूम करे।
उन दो प्रकार के चोरों में से मूल्य तथा तोल या नापने में लोगों के देखते-देखते सोना, कपड़ा आदि बेचते समय ठगनेवाले प्रथम (प्रत्यक्ष) चोर हैं तथा सेध डालकर या जङ्गल आदि में छिपकर रहते हुए दूसरों के धन को चुराने वाले द्वितीय (परोक्ष) चोर हैं।
(और) घूसखोर, डराकर धन लेने वाले ठग, जुआरी (९।२२३ में वर्णित द्यूत या समाह्वय से धन लेने वाले), धन या पुत्रादि के लाभ होने की असत्य बातें कहकर लोगों से धन लेने वाले, उत्तम (साधु, संन्यासी आदि का वेष धारण कर अपने दूषित कर्म को छिपाकर लोगों से धन लेने वाले, हस्तरेखा आदि को देखकर नहीं जानते हुए भी फल को बतलाकर धन लेने वाले।
अशिक्षित हाथीवान्‌, अशिक्षित चिकित्सक (वैद्य डाक्टर, हकीम) चित्रकार आदि शिल्पी, परद्रव्यापहरण में चतुर वेश्या।
इन्हें तथा इस प्रकार के अन्य लोगों को तथा ब्राह्मणादि का वेष धारणकर गुप्तरूप से जनता का उगने वाले शूद्र आदि को प्रत्यक्ष कण्टक (प्रकटरूप में चोर) जानना चाहिये।
उन्हीं के कर्मो को करने वाले, गुप्त, सदाचारी एवं विविध वेष धारण किये दूतों (७।६३-६४) से उन वञ्चको (ठगों) को मालूम करके उनका शासन कर उन्हें वश में करे।
राजा उन वञ्चको (प्रत्यक्ष या परोक्ष चोरों) के जो गुप्त या प्रत्यक्षकृत अपराध हों, उन्हें सबके सामने कहकर उनके अपराध, शरीर एवं धन के अनुसार उनको दण्डित करे।
इन चोरों, पापबुद्धियों तथा गुप्तरूप से विचरण करने वालों का पाप बिना दण्डित किये नहीं रोका जा सकता है (अतएव उन्हें दण्डित करना राजा का है।
सभास्थान, प्याऊ (पौसरा), पूआ-पूड़ी आदि बेचने की दूकान (होटल आदि), गल्ले की दूकान, चौरास्ता, मन्दिर, बड़े-बड़े प्रसिद्ध वृक्षों की जड़ (के नीचे का भाग), अनेक लोगों के एकत्रित होने का स्थान, प्रदर्शनी आदि दर्शनीय स्थान।
पुराने उद्यान, जङ्गल, शिल्पियों (विविध प्रकार के कारीगरों-चित्रकार आदि) के घर, सूने घर, वन, फुलवारी।
ऐसे गुप्त स्थानों में घूमने-फिरने तथा एक स्थान में रहने वाले चोरों को रोकने के लिए राजा गुप्तचरों (या पहरेदारों) को नियुक्त करे।
उन चोरों के सहायक, उनके विविध कार्यों (सेंध मारना आदि) के जानकार जो पहले निपुण चोर रहे हों; ऐसे गुप्तचरों से उन चोरों को मालूम कर राजा उनका नाश करे।
वे गुप्तचर भक्ष्य-भोज्य पदार्थो का लोभ दिखाकर (तुम लोग मेरे यहाँ या अमुक स्थान पर आवो, हम सब एक साथ अमुक स्थान पर चढ़कर उत्तमोत्तम पदार्थ भोजन करेंगे इत्यादि प्रकार से खाने का लोभ देकर), ब्राह्मणों के दर्शन (अमुक स्थान में सब बातों के ज्ञाता एक सिद्धब्राह्मण रहते हैं, उनका दर्शनकर हम लोग अपना मनोरथ पूर्ण करें) इत्यादि कहने से साहस कर्म के कपट से (अमुक व्यक्ति के यहाँ एक बड़ा शूरवीर रहता है, वह अकेला ही अनेक आदमियों के साध्य कार्य को कर सकता है आदि कपट वचनों से), उन चोरों को एकत्रितकर राजा द्वारा नियुक्त शासन पुरुषों (सैनिक सिपाहियों) से उनका समागम करा दे अर्थात्‌ उन्हें गिरफ्तार करा दें।
जो चोर उन गुप्तचरों के उस प्रकार (पूर्व श्लोक में कथित भक्ष्य-भोज्यादि विषयक कपटयुक्त वचनों से) अपने पकड़े जाने की शङ्का से वहाँ (गुप्तचर के सङ्केतित स्थान में) नहीं आवे तथा उन गुप्तचरों से सावधान ही रहते हों; उन चोरों को राजा अपने गुप्तचरों से मालूम कर मित्र, ज्ञाति तथा बान्धवों के सहित उनपर आक्रमण कर उन्हें दण्डित करे।
धार्मिक राजा चुराये गये धन का, सेंध मारने आदि के शास्त्रादि साधनों का पता नहीं लगने से चोर का पूर्णत: निर्णय नहीं होने से उनका वध नहीं करे तथा चुराये गये धन तथा सेंध मारने के शास्त्रादि साधनों के द्वारा चोर का निर्णय हो जाने पर बिना विचारे (दूसरा विकल्प उठाये) उस चोर का वध (अपराधानुसार उन्हें दण्डित) करे।
गाँवों में भी जो काई चोरों के लिए भोजन, चोरी के उपयोगी बर्तन या वस्त्रादि देते हों; राजा उनका भी वध (या निरन्तर अथवा एकबार किये गये अपराध के अनुसार दण्डित) करे।
राज्य की रक्षा में नियुक्त तथा सीमा के रक्षक राजपुरुष भी चोरी करने में मध्यस्थ होकर चोरों के सहायक होते हैं; (अत एव राजा) उनको भी चोरों के समान ही शीघ्र दण्डित करे।
धर्मजीवी (यज्ञ कराने से तथा दान लेकर दूसरों में यज्ञादि धर्मप्रवृत्ति उत्पन्न कर जीविका करनेवाला) ब्राह्मण यदि धर्म मर्यादा से भ्रष्ट हो जाय तो राजा उसे भी दण्ड द्वारा शासित करे।
चौरादि के द्वारा गाँव के लूटने में, पुल या बाँध के टूटने में (मेधातिथि के मत से खेत में उत्पन्न अन्न के नष्ट होने में तथा जीविका नाश होने में) तथा रास्ते में चोर आदि के दिखलाई पड़ने पर यथाशक्ति दोड़कर रक्षा नहीं करने वाले पार्श्ववर्ती (समीप में रहने वाले) लोगों को शय्या, गौ, घोड़ा आदि गृहसाधनों के साथ देश से बाहर निकाल दे।
राजा के कोष (खजाने) से धन चुराने वाले, राजाज्ञा को मारने वाले तथा शत्रु-पक्ष वालों से मिलकर राजकीय लोगों में फूट पैदा करनेवाले लोगों को राजा अनेक प्रकार के (हाथ-पैर जीभ आदि काटकर) वध से दण्डित करे।
जो चोर रात में सेंध मारकर चोरी करते हैं, राजा उनके हाथों को कटवाकर तेज शूली पर चढ़ा दे।
राजा गाँठ काटने वाले (गिरहकट या जेबकट) चोर को पहली बार पकड़े जाने पर उनकी (अँगूठा तथा तर्जनी) अङ्गुलियों को कटवा ले, दूसरी बार पकड़े जाने पर उसके हाथ-पैर कटवा ले और तीसरी बार पकड़े जाने पर उसका वध कर दे।
जो लोग (गिरहकट आदि को जानकर) अग्नि, अन्न, शस्त्र तथा अवसर (चोरी का मौका) देते हों और चुराये हुए धन को रखते हों, राजा उन लोगों को भी चोर के समान दण्डित करे)।
तडाग (पोखरा, अहरा आदि सार्वजनीन जलाशय) के बाँध या पुल तोड़ने वालों को राजा पानी में डुबाकर या दूसरे प्रकार से वध करे अथवा यदि वह उस तोड़े हुए पुल या बाँध को ठीक करा दे तो उसे उत्तम साहस (८।१३८ एक सहस्र पण) से दण्डित करे।
राजा राज्य के अन्नभाण्डार, शस्रागार तथा देवमन्दिर तोड़ने वालों तथा घोड़ा हाथी और रथ आदि चुराने वालों को बिना विचारे (दूसरे प्रकार के दण्ड देने का विकल्प छोड़कर शीघ्र ही) वध करे।
पुत्र आदि के लिए बनवाये गये तडाग आदि के पानी को जो कोई चुरावे अर्थात्‌ चोरीकर खेत आदि की सिंचाई करे अथवा उसके पानी जाने के मार्ग को बाँधकर आदि बाँधक रोके या नष्ट कर दे, उस व्यक्ति को राजा प्रथम साहस (८।१३८-२५० पण) से दण्डित करे।
स्वस्थ रहता हुआ जो व्यक्ति राजमार्ग (प्रधान सड़क, सार्वजनिक रास्ते) पर मल-मूत्र कर दे (या फेंक दे) राजा उसे दो कार्षापण (८।१३६) से दण्डित करे तथा उसी से उस मल-मूत्र को शीघ्र साफ करावे।
रोगी (या आपत्ति में फँसा हुआ) बूढ़ा, गर्भिणी अथवा बालक राजमार्ग पर मल-मूत्र कर दे (या कूड़ा-करकट डालकर उसे गन्दा कर दे) तो (“तुमने यह क्या किया, सावधान? फिर कभी ऐसा मत करना” इत्यादि रूप से) निषेध कर दे तथा उस स्थान की सफाई करा ले (उसे आर्थिक दण्ड न दे) ऐसी शास्त्रमर्यादा है।
चिकित्सा करने वाला यदि अज्ञानवश पशुओं की ठीक चिकित्सा न करे तो उसे प्रथम साहस (२५० पण--८।१३८) तथा मनुष्यों की ठीक चिकित्सा न करे तो उसे मध्यम साहस (५०० पण--८।१३८) से राजा दण्डित करे।
संक्रम (नाले या छोटी नहर आदि को पार करने के लिए रखे गये पत्थर या काष्ठ आदि) ध्वज (राजचिह्न या देवता को की ध्वजा), यष्टि (जाठ-तालाब, पोखरा, बावली आदि के बीच में गाडे गये लकड़ी आदि या पत्थर का खम्भा आदि), प्रतिमा (मिट्टी आदि की छोटी-छोटी पूजित मूर्तियाँ) इनको तोड़ने या किसी प्रकार नष्ट करनेवाले से राजा उन्हें ठीक करावे तथा उस व्यक्ति को पाँच सौ पणों (८।१३६) से दण्डित करे।
शुद्ध पदार्थ में अशुद्ध पदार्थ मिलाकर दूषित करने वाले, नहीं छेदने योग्य माणिक्य आदि को छेदने वाले और छेदने के योग्य मोती माणिक्य आदि को ठीक-ठीक योग्य स्थान पर नहीं छेदने वाले व्यक्ति को राजा प्रथम साहस (ढाई सौ पण ८।१३८) से दण्डित करे तथा जिसके उपर्युक्त पदार्थ नष्ट या दूषित हो गये हों उसे उन पदार्थों का मूल्य देकर वह (पदार्थ-दूषक मनुष्य) प्रसन्न करे।
जो मनुष्य समान मूल्य देने वाले किसी को अच्छी या अधिक वस्तु दे तथा किसी को निकृष्ट या कम वस्तु दे अथवा समान मूल्य की कोई वस्तु किसी को कम मूल्यों में दे और किसी को अधिक मूल्य में दे तो वह मनुष्य (वस्तु के मूल्य आदि के अनुसार) प्रथम साहस (२५० पण) या मध्यम साहस ५०० पण-८।१३८) से दण्डित होता है।
राजा सब प्रकार के बन्धनगृह (जेल, हवालात आदि) को सड़क पर बनवावे। (हथकड़ी-बेड़ी पहनने से) दूषित, दाढ़ी-मूछ आदि बढ़ने से विकृत तथा भूख आदि से दुर्बल अपराधी बन्दियों (कैदियों) को लोग जहाँ देखें।
प्राकार (नगर या मकान का परकोटा अर्थात्‌ चहारदिवारी) को तोड्ने वाले परिखा (खाई) को मिट्टी आदि से भरने वाले और द्वार (राजद्वार या नगरद्वार) को तोड़ने वाले मनुष्य को (राजा) शीघ्र ही देश से बाहर निकाल दे।
सब प्रकार से अभिचार (शस्त्रोक्त-हवनादि करके तथा लौकिक चरण की धूलि लेकर या केश को भूमि में गाड़कर इत्यादि रूप मारणोपाय) कर्म जिसके लिए किया गया हो वह मनुष्य नहीं मरे तो उक्त कर्म करनेवाले पर दो सौ पण (८।१३६) दण्ड होता है (तथा यदि वह मनुष्य पर गया हो तो उक्त कर्म करनेवाले को प्राणदण्ड होता है) और माता-पिता-्स्त्री आदि को छोड़कर दूसरे झूठे लोगों द्वारा मोहितकर धन आदि लेने के लिए वशीकरण और उच्चाटन आदि कर्म करने वाले पर दो सौ पण (८।१३६) दण्ड होता है।
जो मनुष्य नहीं जमने वाले बीज को जमने वाला कहकर बेचे तथा अच्छे बीज में दूषित बीज मिलाकर बेचे और (ग्राम-नगर आदि की) सीमा को नष्ट करे उसे राजा विकृत वध (हाथ, नाक,कान आदि अंगों को काटने) से दण्डित करे।
सब कण्टकों (चोरी आदि पाप कर्म करने से राज्य में कण्टकतुल्य लोगों) में अधिक पापी सोनार यदि अन्याय करने (किसी प्रकार सोना-चाँदी आदि चुराने, या अच्छे धातु के साथ हीन धातु मिलाकर देने) वाला प्रमाणित हो जाय तो राजा उसके प्रत्येक शरीर को शस्त्रों से टुकड़े-टुकड़े कटवा डाले।
खेती के साधन हल-कुदाल आदि, तलवार आदि शस्त्र और दवा को चुराने पर चुरायी गयी वस्तुओं की समयोपयोगिता का विचारकर तदनुसार दण्डविधान करे।
(१) स्वामी (राजा), (२) मन्त्री, (३) पुर (किला, परकोटा, खाई आदि से सुरक्षित राजधानी), (४) राज्य, (५) कोष, (६) दण्ड (चतुरङ्गिणी अर्थात्‌ हयदल, गजदल, रथदल और पैदल सेना) तथा (७) मित्र, ये सात राजप्रकृतियाँ हैं, इनसे युक्त "सप्तांग” (सात अङ्गोंवाला) राज्य कहलाता है।
राज्य की इन (९।२९४) सात प्रकृतियो में क्रमशः पूर्व-पूर्व की आपत्ति को राजा अधिक समझे।
त्रिदण्ड (टिकटी-तिपाई) के समान परस्पर में सम्बद्ध सप्ताङ्ग (९।२९४) राज्य में उन अङ्गों को परस्पर में विलक्षण उपकारक होने से कोई भी अङ्ग एक दूसरे से बढ़कर नहीं है।
(उन (९।२९४) सात प्रकृतियों में से उन-उन कार्यो में उन-उन प्रकृतियों का विशिष्ट स्थान होता है, (अतएव) जो कार्य जिस प्रकृति से सिद्ध होता है उस कार्य में वह प्रकृति श्रेष्ठ मानी जाती है (इस प्रकार कार्य की अपेक्षा से समयानुसार सबकी श्रेष्ठता है)।
राजा गुप्तचरों से सेना के उत्साहसम्बन्ध से और कार्यो मार्ग-निर्माणादि) के करने से उत्पन्न अपनी तथा शत्रु की शक्ति को सर्वदा मालूम करता रहे।
(राजा अपने तथा शत्रु के राज्य में काम तथा क्रोध से किये गये मारण ताइन आदि) पीड़न और व्यसनों की कमी-वेशी को मालूमकर और विचारकर इसके बाद कार्य (सन्धि-विग्रह आदि) को आरम्भ करे।
राजा शत्रुकृत कपट आदि से बार-बार कार्य नाश होने पर भी अपने राज्य को समुन्नत करने वाले कार्यो को बार-बार करता ही रहे; क्योंकि बराबर कार्यारम्भ करने वाले (उद्योगशील) मनुष्य को श्री (विजयलक्ष्मी) निश्चित ही सेवन करती है।
सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग, ये चारों युग राजा के ही चेष्टाविशेष (आचार, व्यवहार) से होते हैं, अतएव राजा ही 'युग' कहलाता है (इस कारण युग के अनुसार कार्य फल देते हैं ऐसा विचारकर राजा को कार्यारम्भ से उदासीन कभी नहीं होना चाहिये)।
सोते हुए (अज्ञान तथा आलस्यादि के कारण उद्यमहीन) राजा के होने पर कलियुग, जागते हुए (जानते हुए भी उद्यम नहीं करने वाले) राजा के होने पर द्वापरयुग, कर्म (सन्धि-विग्रहादि राजकार्य) में लगे हुए राजा के होने पर त्रेतायुग और शास्त्रानुसार विचरण करने वाले राजा के होने पर सत्ययुग होता है।
राजा को इन्द्र, सूर्य, वायु, यम, वरुण, चन्द्रमा, अग्नि और पृथिवी के तेज का आचरण करना चाहिये। (राज्य के कण्टकभूत चोर आदि को वश में करने के लिए प्रताप = दण्ड तथा स्नेह - दोनों का ही समयानुसार कार्य में प्रयोग करना चाहिए)।
जिस प्रकार इन्द्र श्रावण आदि चार मासों में (अन्नादि की वृद्धि के लिए) जल बरसाते हैं, उसी प्रकार इन्द्र के ब्रत का आचरण करता हुआ राजा अपने राज्य में आए हुए साधु-महात्माओं को इच्छा को पूरा करे।
जिस प्रकार सूर्य अगहन आदि आठ मासों में किरणों के द्वारा जल को हरण करता (लेता = सुखाता) है, उसी प्रकार राजा राज्य से कर को लेवे यह राजा का 'सू्यत्रत' है।
जिस प्रकार वायु सब प्राणियों में प्रवेशकर विचरण करता है, उसी प्रकार राजा को गुप्तचरों द्वारा सर्वत्र प्रवेश करना चाहिये, यह राजा का 'वायुत्रत' है।
जिस प्रकार यमराज समय आने पर प्रिय और अप्रिय सब को मारता है, उसी प्रकार राजा समय आने (अपराध करने) पर प्रिय-अप्रिय सब प्रजाओं को दण्डित करे; यह राजा का “यमव्रत” है।
जिस प्रकार बन्धन के योग्य मनुष्य वरुण के पाश से बँधा हुआ ही दीखता (अवश्य बाँधा जाता) है, उसी प्रकार राजा पापियों (अपराधियों को, जब तक वे सन्मार्ग पर नहीं आ जायँ तब तक) निग्रह करे, यह राजा का 'वरुणब्रत' है।
जिस प्रकार परिपूर्ण चन्द्रमा को देखकर मनुष्य हर्षित होते हैं उसी प्रकार अमात्य आदि प्रकृति (९।२९४) तथा समस्त प्रजा) जिस राजा को देखकर हर्षित हों, वह राजा चान्द्रव्रतिक (“चन्द्रव्रत' वाला) है।
राजा पापियों (अपराधियों) को दण्डित करने में सर्वदा प्रचण्ड तथा असह्य तेजवाला होवे तथा दुष्ट (प्रतिकूल व्यवहार करनेवाले) मन्त्री आदि का वध करनेवाला होवे, यह राजा का 'आग्नेयत्रत' है।
जिस प्रकार पृथ्वी सब प्राणियों को समान भाव से धारण करती है, उसी प्रकार सब प्रजाओं का समान भाव से पालन करते हुए राजा का वह “पार्थिव (पृथिवीसम्बन्धी) व्रत” है।
राजा इन सब तथा अपनी बुद्धि से प्रयुक्त दूसरे उपायों से युक्त एवं सर्वदा आलस्यहीन होकर अपने राज्य में रहने वाले तथा दूसरे राज्य में रहते हुए अपने राज्य में आकर चोरी करने वाले चोरों का निग्रह करे (उन्हें दण्डित कर रोके)।
(कोषक्षयादि रूप) महाविपत्ति में फँसा हुआ भी राजा ब्राह्मणों को क्रुद्ध न करे; क्योंकि वे क्रुद्ध ब्राह्मण सेनावाहन के सहित इस राजा को (शाप तथा अभिचार मारणमोहनादि कर्म से) तत्काल नष्ट कर देते हैं।
जिन ब्राह्मणों ने (शाप देकर) अग्नि को सर्वभक्षी, समुद्र को अपेय (नहीं पीने योग्य-खारे पानी वाला) और चन्द्रमा को क्षययुक्त कर पीछे पूरा किया, उन (ब्राह्मणों) को क्रुद्धकर कौन नष्ट नहीं हो जायेगा? अर्थात्‌ सभी नष्ट हो जायेंगे (अतएव ब्राह्मणों को क्रुद्ध कदापि नहीं करना चाहिये)।
जो ब्राह्मण स्वर्ग आदि दूसरे लोकों तथा लोकपालों की रचना कर सकते हैं तथा क्रोधित करने पर शाप आदि से देवों को भी अदेव (मनुष्य आदि) कर सकते हैं; उन ब्राह्मणों को पीड़ित करता हुआ कौन मनुष्य उन्नति को पा सकता है।
यज्ञ को करने-कराने वाले जिन ब्राह्मणों का आश्रयकर (पृथ्वी आदि) लोक तथा (इन्द्र आदि) देव स्थिति पाते हैं और ब्रह्म (वेद) ही जिनका धन है, उन ब्राह्मणों को जीने का इच्छुक कौन व्यक्ति मारेगा? अर्थात्‌ कोई नहीं।
जिस प्रकार शास्त्र-विधि से स्थापित अग्नि तथा सामान्य अग्नि दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार मूर्ख तथा विद्वान्‌ दोनों ही ब्राह्मण श्रेष्ठ देवता हैं (इस कारण मूर्ख ब्राह्मण का भी निरादर नहीं करना चाहिए)।
जिस प्रकार तेजस्वी अग्नि श्मशानो में भी (शव को जलाती हुई) दूषित नहीं होती, और यज्ञों में हवन करने पर फिर अधिक बढ़ती ही है।
उसी प्रकार यद्यपि ब्राह्मण निन्दित कर्मो में भी प्रवृत्त होते हैं, तथापि सब प्रकार से ब्राह्मण पूज्य हैं; क्योंकि वे उत्तम देवता हैं।
अत्यन्त समृद्ध (तेजस्वी) भी क्षत्रिय यदि ब्राह्मण को पीड़ित करे तो उसका (शाप आदि के द्वारा) शासन करने वाला ब्राह्मण ही है; क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मण (की बाहु) से उत्पन्न है।
पानी से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय और पत्थर से लोहा (परम्परा द्वारा तलवार, बाण आदि शस्त्र) उत्पन्न हुए हैं; सर्वतोगामी उनका तेज अपनी योनि (उत्पन्न करने वाले) में शान्त (शक्तिहीन) हो जाता है।
ब्राह्मण के बिना क्षत्रिय तथा क्षत्रिय के बिना ब्राह्मण समृद्धि को नहीं पा सकते, (किन्तु) मिले हुए ब्राह्मण तथा क्षत्रिय इस लोक में तथा परलोक में (धर्मार्थकाममोक्ष रूप चतुर्विध पुरुषार्थ को पाने से) समृद्धि को पाते हैं।
सब दण्डों (जुर्माने) से प्राप्त धन को ब्राह्मणों के लिए देकर तथा राज्य को पुत्र के लिए सोंपकर (क्षत्रिय राजा) युद्ध में प्राणत्याग करे (और युद्ध के असम्भव होने पर) अनशन आदि से प्राणत्याग करे।
इस प्रकार (सप्तम से नवम अध्याय तक में वर्णित) राजधर्मो में तत्पर होकर व्यवहार करता हुआ राजा लोक-व्यवहार कार्यो में समस्त भृत्यों को नियुक्त करे।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि मैंने) राजा के इस समस्त सनातन कर्मविधान को कहा, अब क्रमश: वैश्य तथा शूद्र के वक्ष्यमाण कर्मविधान को जानना चाहिये।
वैश्य यज्ञोपवीत संस्कार होने के बाद विवाह को करके खेती आदि करने तथा पशुपालन में सर्वदा लगा रहे।
ब्रह्मा ने पशुओं की सृष्टि करके पालन (करने के लिए) वैश्यों को दिया तथा सब प्रजाओं की सृष्टि करके (रक्षा करने के लिए) ब्राह्मण तथा राजा को दिया।
"मैं पशुपालन नहीं करूँ" ऐसी इच्छा वैश्य को कदापि नहीं करनी चाहिये और वैश्य को पशुपालन की इच्छा करते रहने पर राजा को दूसरे से पशु-पालन नहीं कराना चाहिये।
मणि, मोती, मूँगा, लोहा, कपड़ा गन्ध (कर्पूर आदि) और रस (नमक आदि) के मूल्य की कमी-वेशी को वैश्य देश-कालानुसार मालूम करे।
सब बीजों को बोने की विधि (कौन बीज किस समय कैसे खेत में, कितने प्रमाण में किस प्रकार बोया जाता है, इत्यादि विधि), खेतों के गुण तथा दोष, तौल (मन, आधमन, पसेरी, सेर, छटाक आदि तथा तोला, मासा, रत्ती आदि) तथा तौलने के उपाय; इन सबको अच्छी तरह मालूम करे।
वस्तुओं की सारता (अच्छापन) तथा निःसारता (ख़राबी) देशों के गुण तथा दोष, सौदो (बेचे जाने वाली वस्तुओं) के लाभ तथा हानि, पशुओं को बढ़ाने के उपाय (किस समय में कैसा कार्य करने से पशुओं की उन्नति होगी इत्यादि उपाय)।
नौकरों (या मजदूरों) का (देश, काल तथा परिश्रम के अनुसार) वेतन, मनुष्यों की अनेक देश की भाषा, वस्तुओं के योग्य स्थान तथा मिलावट (अमुक वस्तु अमुक स्थान में रखने पर तथा मिलाने पर बिगड़ेगी या सुरक्षित रहेगी, इत्यादि), क्रय विक्रय का ज्ञान (अमुक वस्तु को स्थान तथा समय में खरीदने तथा बेचने से लाभ होगा, इत्यादि) इन सब विषयों को वैश्य अच्छी तरह मालूम करे।
वैश्य इस प्रकार (९।३२६-३३२) धर्म से (व्यापार, पशुपालन तथा खेती के द्वारा) धन बढ़ाने का उद्योग करता रहे तथा सब प्राणियों के लिए प्रयत्नपूर्वक अन्न का ही अधिक दान करता रहे।
वेदज्ञाता ब्राह्मणों तथा यशस्वो सदगृहस्थों की सेवा करना ही शूद्र का कल्याणकारक उत्तम धर्म है।
शुद्ध (बाहरी शारीरिक शुद्धि तथा भीतरी मानसिक शुद्धि से युक्त), अपने से श्रेष्ठ जाति वालों की सेवा करने वाला, मधुर भाषण करने वाला, अहङ्कार से रहित और सदा ब्राह्मणादि के आश्रम में रहने वाला शूद्र श्रेष्ठ जाति को प्राप्त करता है।
(भृगुजी महर्षियों से कहते हैं कि मैंने) आपत्तिकाल नहीं रहने पर वर्णो (ब्राह्मणादि चारों वर्णो) के कल्याणकारक कर्म को कहा, उन (ब्राह्मणादि वर्णो) के आपत्तिकाल में भी जो धर्म हैं, उसे (आप लोग कहते हुए मुझसे) मालूम कीजिये।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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