विधिवत्प्रतिगृह्यापि त्यजेत्कन्यां विगर्हिताम् ।
व्याधितां विप्रदुष्टां वा छद्मना चोपपादिताम् ।।
विधि (३।३५) के अनुसार कन्या को ग्रहणकर भी विधवा के लक्षणों से युक्त, रोगिणी, क्षतयोनि (या शापादि) दोष से युक्त अथवा (अधिकाङ्गी या होनाङ्गी होने पर भी उस दोष को छिपाकर) कपटपूर्वक दी गयी कन्या को द्विज सप्तपदी होने के पहले छोड़ दे।
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