दौहित्रो खिलं रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् ।
स एव दद्यादद्वौ पिण्डौ पित्रे मातामहाय च ।।
नाती (“पुत्रिका" (९।१२७) का पुत्र) ही दूसरे पुत्र के नहीं रहने पर पिता का भी सब धन प्राप्त करे और वही अपने पिता तथा नाना के लिए दो पिण्ड देवे।
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