महर्षि भृगुजी ऋषियों से कहते हैं कि अब मैं धर्म मार्ग में रहते हुए स्त्री-पुरुष के संयोग और वियोग होने (साथ और अलग रहने) पर नित्य (सनातन) धर्म को कहुँगा।
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