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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 91
अदीयमाना भर्तारमधिगच्छेद्यदि स्वयम्‌ । नैनः किञ्जिदवाप्नोति न च यं साऽधिगच्छति ।।
(पिता आदि के द्वारा किसी योग्यतर) वर के लिए नहीं दान करने पर जो (ऋतुमती कन्या ऋतुकाल से तीन वर्ष तक प्रतीक्षा कर अपनी समान योग्यतावाले) पति का स्वयं वरणकर लेती है तो वह कन्या तथा पति थोड़ा भी दोषभागी नहीं होते हैं।
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