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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 260
एवमाद्यान्विजानीयात्रकाशांल्लोककण्टकान्‌ । निगूढचारिंणश्चान्याननार्यानार्यालिङ्गिनः ।।
इन्हें तथा इस प्रकार के अन्य लोगों को तथा ब्राह्मणादि का वेष धारणकर गुप्तरूप से जनता का उगने वाले शूद्र आदि को प्रत्यक्ष कण्टक (प्रकटरूप में चोर) जानना चाहिये।
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