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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 207
भ्रातृणां यस्तु नेहेत धनं शक्तः स्वकर्मणा । स निर्भाज्यः स्वकादंशात्किञ्जिहत्वोपजीवनम्‌ ।।
भाइयों में से अपने उद्योग में समर्थ जो भाई पिता के धन से भाग लेना नहीं चाहे, तब सब भाई पिता के धन में से कुछ भाग देकर उसे अलग कर दें।
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