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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 95
देवदत्तां पतिभार्या विन्दते नेच्छयात्मनः । तां साध्वीं बिभृयान्नित्यं देवानां प्रियमाचरन्‌ ।।
पति (सूर्य आदि) देवों के द्वारा ही दी गयी स्त्री को प्राप्त करता है, अपनी इच्छा से नहीं प्राप्त करता, अतएव (उन) देवों का प्रिय करता हुआ (वह पति) उस सदाचारिणी स्त्री का अन्न, वस्त्र तथा आभूषण आदि से सर्वदा पोषण करे।
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