यैः कृतः सर्वभक्षोऽग्निरपेयश्च महोदधिः ।
क्षयी चाप्यायितः सोमः को न नश्येत्प्रकोप्य तान् ।।
जिन ब्राह्मणों ने (शाप देकर) अग्नि को सर्वभक्षी, समुद्र को अपेय (नहीं पीने योग्य-खारे पानी वाला) और चन्द्रमा को क्षययुक्त कर पीछे पूरा किया, उन (ब्राह्मणों) को क्रुद्धकर कौन नष्ट नहीं हो जायेगा? अर्थात् सभी नष्ट हो जायेंगे (अतएव ब्राह्मणों को क्रुद्ध कदापि नहीं करना चाहिये)।
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