(महामुनि भृगुजी मुनियों से कहते हैं कि मैंने) परस्पर विवाद करते हुए वादी तथा प्रतिवादियों (मुद्दई तथा मुद्दालहों) के अठ्ठारह प्रकार के (८।४-७) विवादों में व्यवहार (मुकदमे) के निर्णय को विस्तारपूर्वक कहा।
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