तथा च श्रुतयो बह्व्यो निगीता निगमेष्वपि ।
स्वालक्षण्यपरीक्षार्थ तासां श्रृणुत निष्कृतीः ।।
(स्त्री-स्वभाव को व्यभिचारशील बतलाकर अब उसमें प्रमाण कहते है-) और शास्त्रों में बहुत-सी श्रुतियाँ (“न चैतद्रिद्यो ब्राह्मणा: स्मोऽब्राह्मणा वा' इत्यादि वेदवाक्य) व्यभिचार की परीक्षा के लिए पढ़ी गयी हैं, उनमें से (प्रायश्चित्तरूप) एक श्रुति को (आप लोग) सुनें।
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