उन्मत्तं पतितं क्लीबमबीजं पापरोगिणम् ।
न त्यागोऽस्ति द्विषत्याश्च न च दायापवर्तनम् ।।
(वायु आदि के दोष से) उन्मत्त (पागल), पतित (११।१७०-१७८) नपुंसक, निर्वीर्य (जिसका वीर्य स्थिर नहीं रहे) और पापरोगी (कोढ़ी आदि) की सेवा नहीं करनेवाली स्त्री का पति न तो त्याग करे और न उसके धन या भूषण आदि का ही ग्रहण करे।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।