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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 79
उन्मत्तं पतितं क्लीबमबीजं पापरोगिणम्‌ । न त्यागोऽस्ति द्विषत्याश्च न च दायापवर्तनम्‌ ।।
(वायु आदि के दोष से) उन्मत्त (पागल), पतित (११।१७०-१७८) नपुंसक, निर्वीर्य (जिसका वीर्य स्थिर नहीं रहे) और पापरोगी (कोढ़ी आदि) की सेवा नहीं करनेवाली स्त्री का पति न तो त्याग करे और न उसके धन या भूषण आदि का ही ग्रहण करे।
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