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मनुस्मृति • अध्याय 9 • श्लोक 161
यादृशं फलमाप्नोति कुप्लवैः सन्तरं जलम्‌ । तादृशं फलमाप्नोति कुपुत्रैः सन्तरंस्तमः ।।
तृण आदि की बनी हुई दूषित नाव से पानी को पार करता हुआ मनुष्य जैसा फल पाता है वैसा ही फल (क्षेत्रज आदि) कुपुत्रो के द्वारा अन्धकार (रूप पारलौकिक दुःख) को पार करता हुआ पाता है (अतएव क्षेत्रजादि पुत्र औरस पुत्र के समान सम्पूर्ण कार्य करने में समर्थ नहीं होते; बल्कि पारलौकिक दु:ख को पार करने में औरस पुत्र ही समर्थ होता है)।
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